फेसबुक पर कई मित्र अपने नवजात शिशु की तस्वीरें लगाते हैं - सोते हुए अबोध की अनजाने में ली हुई तस्वीरं।
उन तस्वीरों पर बधाई और बधाईनुमा टिप्पणी देने वालों की संख्या और उत्साह देखकर मन में एक हूक सी उठती है - इतने सारे शिशु-प्रेमी एक साथ! साधुवाद!
बधाईयों और प्रशंसा से गदगद ये मित्र अपने शिशुओं की प्रगति की फिर माहवार तस्वीर लगाते हैं। और उन्हें माहवार बधाईयां मिलती जाती हैं। और ये सिलसिला जारी रहता है।
लोग अपने घरों की, अपनी गाडि़यों की अपने बीते लमहों की तस्वीरें लगाते नहीं थकते। और उनकी उन फोटो और टिप्पणियों पर वाह वाह करते उनके मित्र भी नहीं थकते।
मेरे दिल का हूक टीस में और टीस दर्द में बदलता रहता है।
कई बार मन किया कि अपने मित्रांे को टोकूं, ‘भाई साहब, जिसकी तस्वीर लगा रहे हो, उससे एक बार पूछ तो लो।‘ लेकिन कुछ खास मित्रों की सलाह और सामाजिक शालीनता के कारण टोकने की अपनी ललक को टालता रहा।
पिछले कुछ दिनों में औपचारिक बधाईयां लेने देने की गतिविधि इतनी ज्यादा बढ गयी है कि आप कुछ भी कीजिए , उसके बारे में बताईये ज़रूर। जैसे कि आपने पकोड़ा खाया तो, बताईये कि आपने पकोड़ा खाया। और उम्मीद कीजिए कि आपके मित्र आपके पकोड़े खाने पर आपको बधाई देंगे।
बधाई के इस कारोबार में मैं खुद को हमेशा किनारे पर ही पाया। मैं पकोड़े खाने जैसी चीज पर बधाई देने में हिचकता हूं। मैं इस बात पर भी बधाई देने में हिचकता हूं कि आपक आप वसंतकुंज से उठकर पहाड़गंज चले गए या जयपुर चले गए या फिर बंगलादेश और अमेरिका ही क्यों ना चले गए।
मुझे लगता है मनुष्य एक विचरणशीलप्राणी है और इन बातों के लिए बधाई देना वैसा ही होगा जैसे किसी बच्चे को उसके हंसने या रोने के लिए बधाई दी जाय।
लेकिन हमारे कई मित्र ऐसे हैं जो आपके थैले पर लगे एअर टैग देखकर बधाई देने के लिए तैयार हो जाएंगे ‘‘बधाई हो, आपने हवाई यात्रा की है !‘‘
मैं सोचता रहा कि बधाई देने लेने वाले ये लोग ऐसा क्यों करते हैं, इतना शोर क्यों मचाते हैं ? आप एक घटिया सी कहानी, घटिया सी कविता या घटिया सी फोटो खीचिए और चिपका दीजिए फेसबुक पर। और देखिए बधाईयुक्त टिप्पणियों की झड़ी!
संभव है बधाईयों से मेरी चिढ़ इसलिए भी हो कि मुझे अपने किए धरे के लिए कभी कुछ खास बधाई नहीं मिली है। मेरे सबसे करीबी संबंधी और मित्रों का मानना तो ये है कि मैंने अब तक कुछ ही नहीं तो बधाई किसी बात की। इन दोनों बातों में सत्यता है।
फिर भी, कुछ बातें बल-धकेल।
एक प्राणी के रूप में आदमी की कई विशेषता बताई गयी है। जैसे, मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, मनुष्य हथियार बनाने वाला प्राणी है, मनुष्य भाषा का प्रयोग करने वाला प्राणी है, मनुष्य आध्यात्मिक प्राणी है, आदि और इत्यादि।
आदमी के इन वैशिष्ट्य को बताने वाले इन विद्वानों ने, जाहिर तौर पर कई शोध और प्रयोग किए, तब जाकर वे अपने-अपने निष्कर्ष पर पहुंचे।
लेकिन बिना प्रयोग के, सिर्फ अनुभव के आधार पर , और इसमें सन्निहित सारे खतरे को उठाते हुए, यह भी कहा जा सकता है कि आदमी एक प्रचारवादी प्राणी है।
इस पृथ्वी का दूसरा कोई प्राणी अपने होने, करने, लेने, देने, जीने, मरने - मतलब कि ‘ने‘ से खत्म होने वाले जितने भी कर्म-कुकर्म हैं, का जितना ढिंढोरा आदमी पीटता है, कोई दूसरा प्राणी नहीं।
इस छोटी सी बात को साबित करने के लिए ज़्यादा मशक्कत करने की जरूरत नहीं है। एक कुत्ता या दुनिया का कोई भी दूसरा जीव अपने पैदा होने से लेकर मरने तक सारा काम बिना ढिंढोरा पीटे करता है।
अभी हाल तक आदमी भी ऐसा ही करता था। उसे इतना पता था कि व्यक्तिगत स्तर पर कौन सी सूचना छिपाने लायक है और कौन सी बताने लायक। इतना ही नहीं, उसे ये भी पता था कि कौन सी सूचना किससे छिपायी जाए और कौन सी किससे बतायी जाय।
लेकिन सूचना क्रांति की आंधी में आदमी की ये समझ हवा हो गयी। आज हम सब अपनी-अपनी दुकान सजाये बैठे हैं अपनी-अपनी सूचना बेचने के लिए। जो सूचना जितनी ताजा, निजी, और व्यक्तिगत होगी, उसकी क़ीमत उतनी ही ज़्यादा।
हर दृष्टि से पुरुष की निजता मुकाबले स्त्री की निजता एक ज्यादा गंभीर विषय है। इसलिए खुल्लम खुल्ला सूचना के इस युग में स्त्री की निज़ता के बहाने, आईये, सूचना की प्रकृति और प्रारूप को देखें।
ऐश्वर्या राय सूचना समाज़ की पहली स्त्री नहीं है , जिसके गर्भवती होने की खबर से हम सब बाखबर हैं। ऐश्वर्या से पहले भी कई नामी गिरामी हस्ती गर्भवती हुईं। अभी हाल में कार्ला ब्रूनी के गर्भवती होने की खबर आयी। उससे पहले डेमी मूर के बारे में तो हम सब जानते हैं ‘जिन्होंने गर्भ के नौंवे महीने में अपनी निर्वस्त्र तस्वीर खिंचवाईं थीं।
गर्भवती होना स्त्री के लिए एक स्वाभाविक स्थिति है (आजकल तो कुछ हिम्मतवर पुरुष के लिए भी)।
शायद ही कोई ऐसी स्त्री होगी, जो अपनी इस स्थिति को अपने आस पास के लोगों से छिपा पाती होगी। लेकिन गर्भवती होने की अपनी स्थिति के बारे में पूरी दुनिया को बताना कृत्रिम और भौंडे नाटकीय प्रचार के सस्ता नुस्खा से ज़्यादा कुछ नहीं लगता।
नहीं, मैं किसी व्यक्ति, उसकी किसी स्थिति, उस स्थिति के बारे में किसी खबर या सूचना के खिलाफ नहीं हूं। मैं सूचना बनाने वाले इस तंत्र की चालाकी और इस तंत्र की चपेट में आने वाले लोगों की मासूमियत से दंग हूं।
निजी और अंतरंग सूचना का एक बड़ा बाज़ार तैयार हो रहा है। पोर्न इंडस्टी अपने खरीददारों की बढती मांग पूरी करने के लिए मुख्य धारा के अखबार और टेलीविजन का सहारा ले रही है।
रियलिटी टेलीविज़न शो के नाम पर दिखाए जा रहे कार्यक्रम (एगोनी आंट या मोमेंट आफ टु्रथ) की विषय-वस्तु को गौर से देखिए और डरिये और चेतिए।
आज सेलीब्रिटी की खबर बिक रही है। कल जिसकी खबर बिकेगी वही सेलीब्रिटी होगा। आपके सबसे अंतरंग समय के सीधे प्रसारण के ढेर सारे दर्शक भी मिलेंगे और प्रायोजक भी।
नहीं, न्युड डांस बार के इलाके के सभी पड़ोसियों के लिए यह अनिवार्य नहीं होता कि वे भी अपने कपड़े खोलें और जाकर डांस बार में नाचने लगें।
फेसबुक, ब्लाॅगस्पाॅट, यूट्युब के आने से विचार और सूचना की आवाजाही तेज हुई है , लेकिन इन माध्यमों में जहां आपका कोई संपादक/संचालक नहीं है, वहां आपको अपनी एक एक बात ज्यादा सोच-समझकर रखना होगा। प्रचार की अपनी मायावी भूख पर काबू पाईये और सांस्कृतिक मधुमेह (डायबीटीज़)
के शिकार होने से बचिए।
श्याम आनंद झा
Wednesday, June 29, 2011
Tuesday, June 21, 2011
झूठ , जिससे हम सबका वास्ता है!
महाभारत की कई कहानियां झूठ और सच के महीन अंतर को रेखांकित करती हैं। जब गुरू द्रोण पांडवों की सेना पर कहर ढा रहे थे , उनके प्रकोप से बचने के लिए एक उपाय के बारे में सोचा गया जो झूठ पर आधारित था।
कृष्ण ने रणनीति बनाई की अगले दिन के युद्ध में अश्वत्थामा नाम के हाथी को मारा जाय और प्रचार किया जाय कि द्रोण का बेटा अश्वत्थामा मारा गया।
सच बोलने के लिए मशहूर युद्धिष्ठिर ने इसे अनुचित माना और कृष्ण की बात माानने से अस्वीकार कर दिया। लेकिन उन्हें कृष्ण ने अपनी समझदारी से आधा सच और आधा झूठ बोलने के लिए राजी कर लिया।
अगले दिन हुआ भी वही। अश्वत्थामा हाथी मारा गया। और युद्ध लड़ते हुए द्रोण के कान तक बात पहुंचायी गयी कि उनका बेटा अश्वत्थामा मारा गया।
कृष्ण की कुटिलता से परिचित द्रोण ने समाचार के सत्यापन के लिए युद्धिष्ठिर से पूछा कि क्या सचमुच मेरा बेटा अश्वत्थामा मारा गया ? युद्विष्ठिर ने जवाब दिया ‘जी गुरूदेव, अश्वत्थामा मारा गया। ‘ कहानी के मुताबिक युद्धिष्ठिर के इतना कहते ही कृष्ण ने जोर से शंख बजाया और गुरू द्रोण युद्धिष्ठिर के कथन का उत्तराशं - ‘लेकिन नर नहीं, हाथी‘, नहीं सुन पाए।
इस बात पर अभी भी बहस हो सकती है कि युद्धिष्ठिर ने जो कहा वो सच था या झूठ ? विश्वास ना हो तो राम से पूछिए। वह चाहें तो दोनों बातें साबित कर सकते हैं। आप सहमत हों या ना , बला से। राम कौन ? राम जेठमलानी।
खैर, भारत की पौराणिक और धार्मिक कहानियों से पता चलता है कि अपने यहंा झूठ बोलने की लंबी परंपरा है। झूठ सच नामक सिक्के का दूसरा पहलू भर है। शायद कभी झूठ का अच्छा खास बोलबाला रहा होगा, ऐसा अनुमान सच के प्रति बाद के दूराग्रह को देखकर लगाया जा सकता है।
सच के साथ जुड़ी नैतिकता को अगर थोड़ी देर के लिए स्थगित कर दें तो इस बात से असहमत होना कठिन होगा कि झूठ बोलना एक रचनाशील काम है। आपमें कल्पनाशीलता और रचनाशीलता जैसे गुण नहीं हैं तो आप झूठ नहीं बोल सकते।
बच्चे इस बात के सबसे अच्छे उदाहरण हो सकते हैं। बच्चे झूठ नहीं बोलते , तब तक जब तक कि वे बोलना सीखने में व्यस्त रहते हैं। एक बार जब वे भाषा के सामान्य अर्थ और नीहितार्थ का भेद जान लेते हैं , फिर जम कर बोलते हैं। एक बच्चा के दिमाग की तीक्ष्णता , कल्पनाशीलता और रचनाशीलता का पता इस बात से लगाया जा सकता है कि वो अपने सच और भाषा के साथ कैसा खिलवाड़ करता है।
लेकिन हम बच्चे से सच बोलने की जिद्द करते हैं। अपनी बुद्धि का डंडा चलाते हुए हर बार बच्चे का झूठ पकड़ लेते हैं और कहते हैं - ‘नहीं , झूठ नहीं। झूठ से मुझे सख़्त नफ़रत है। तुम झूठ बोलोगे और मैं पकड़ लूंगा। खबरदार जो फिर कभी झूठ बोला।‘
सच बोलने की इस जिद्द के पीछे शायद हमारे बलवादी देवताओं का और उनके समर्थकों का हाथ है। सच
के ज्यादातर पैरोकार पौराणिक कहानियों के वे क्षत्रिय राजकुमार हैं , जो भले ही बलवान हों लेकिन उनकी बुद्धि की तीक्ष्णता संदीग्ध है।
राम से पहले राजा हरिश्चंद्र की कहानी हम जानते हैं। कहानी के मुताकिब हरिश्चंद्र शायद राम के पूर्वज ही थे। हरिश्चंद्र सत्य तो बोलते थे , लेकिन उनकी सत्यता आत्मघाती था और उसमें किसी किस्म की विलक्षणता का अभाव है। उनके यहां सत्य हठ बन जाता है। हरिष्चंद्र की कहानी भोंडे ढंग से नाटकीय और भावुक है। इतना नाटकीय है कि अविश्वसनीय है। जो इंसान सपने और जीवन के फर्क को ना समझ ना पाए , उससे और क्या उम्मीद कर सकते हैं !
सत्य के प्रति राम का आग्रह भी मूलतः उनके बल का आग्रह ही था। राम को अगर वाल्मीकि , कंबन , तुलसी , और रामानंद सागर जैसे कवि कहानीकारों का साथ नहीं मिला होता तो, हमें उनके सत्य प्रेम से ज्यादा उनके बल प्रेम के बारे में पता होता।
भारतीय देवताओं में ज्यादातर बाहुबली क्षत्रिय हैं , जिनके चरित्र में हास - परिहास और जीवन के रंग का भारी अभाव है। अपने अनुभव से हम इस बात को समझ सकते हैं कि अपने बल और सामथ्र्य में अंधा विश्वास रखने वाला कभी अपनी वाक्श्क्ति पर भरोसा नहीं करता। रामायण की कहानी में कोई ऐसा अंश नहीं है जब आप राम के वाक्चातुर्य से मोहित हो जांय। संक्षेप में राम बुद्धि के नहीं बल के देवता हैं।
ब्ुद्धि वाले सारे गुण कृष्ण में थे। इसलिए कृष्ण को झूठ से कोई परेशानी नहीं है। वह झूठ बोलते भी हैं और झूठ बोलने वाले को प्रश्रय भी देते हैं।
झूठ को पाप घोषित किए जाने के पीछे इन्हीं बलवादी देवताओं के समर्थकों का हाथ है। जो भी हो, झूठ के बिना दुनियावी इंसान का काम नहीं चल सकता। हम अक्सर झूठ का सहारा ऐसी ही परिस्थितियों में लेते हैं, जहां सच हमें मुश् िकल में डाल सकता है। झूठ की इस सामाजिक उपयोगिता को हम अस्वीकार नहीं कर सकते।
लेकिन विडंबना है कि झूठ का सहारा लेकर जीने वाले आप-हम जैसे तमाम लोग झूठ और झूठ बोलने वाले को कोसने का कोई अवसर नहीं छोडते। बात-बात में यह कहना कि ‘ये झूठ है , गलत है या फिर कि फलां आदमी पर विष्वास नहीं किया जा सकता क्योंकि वो झूठ बोलता है , झूठ और झूठ बोलने वालों की सामाजिक प्रतिष्ठा में बड़ी बाधा पैदा करती है।
जो लोग सच को सर पर लेकर घूमते हैं , वे भी बगल में झूठ की गठरी दवाए रखते हैं। हमारे यहां तो लोग झूठ की खेती करने का आरोप दूसरे पर लगाते हैं , लेकिन झूठ की फसल काट कर अपना गुज़ारा चलाते हैं।
अगर हम आज के सूचना युग और सूचना समाज को देखें तो यहां एक चीज जो सबसे ज्यादा झूठ बेची या खरीदी जाती है वह है झूठ। राष्टीय अंतराष्टीय स्तर के झूठ के कुछ नमूने देखिए: श्रीलंका के किसी चट्टान पर सीता के पद चिन्ह दिखाई देते हैं। साईवेरिया में कहीं दूसरे ग्रह के अज्ञात जीव का शव मिलता है। भारत दुनिया का सबसे आदर्श लोकतंत्र है। अमेरिका दुनिया में लोकतंत्र और शांति स्थापित करना चाहता है। ओसामा बिन लादेन शहीद हो गया। कांग्रेस की सरकार भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए कटिवद्ध है। भाजपा एक राष्टवादी पार्टी है। मायावती दलितों के उत्थान के लिए काम करती है। राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनने के लायक है। करुणा की कनी ने सिनेयुग के तोरानी से 200 रूपए कर्ज लिए थे। ये इस सूचना युग और समाज के ऐसे भोंडे सत्य हैं जिन्हें जन-संचार के उपलब्ध सारे माध्यम प्रचारित प्रसारित करने में व्यस्त हैं।
समस्या इन शर्मनाक भौंडे सत्यों से नहीं हैं। सच का जाप करते हमारे लोकतांत्रिक संस्थाओं से है। विद्यालय से लेकर न्यायालय तक और सड़क से लेकर संसद तक पिछले साठ सालों में सच की पूंछ पकड़कर राजा हरिश्चंद्र की ये संतानें आज यहां तक पहुंच चुकी है।
अगर हमने झूठ को , जीवन के रास रंग को , हास परिहास को अपने सार्वजनिक संस्थानों में थोड़ी सी इज्ज़त दी होती तो हमारा सच इतना लिजलिज़ा नहीं होता।
पांडवों के पांच शिशुओं का , रात के अंधेरे में धोखे और छल से , वध करने वाला अश्वत्थामा का मारा जाना युद्धिष्ठिर के सच बोलने से ज़्यादा जरूरी था।
ये झूठ है कि झूठ बोलना पाप है। आईये थोड़ा-थोड़ा झूठ बोलते रहें , ताकि सच कहीं बेरंग ना हो जाय , सच का संज्ञान कहीं लुप्त ना हो जाय।
नहीं , हर बार झूठ बोल रहे बच्चे को टोकिए मत कि वो झूठ बोल रहा है , क्योंकि झूठ से हम सबका वास्ता है।
कृष्ण ने रणनीति बनाई की अगले दिन के युद्ध में अश्वत्थामा नाम के हाथी को मारा जाय और प्रचार किया जाय कि द्रोण का बेटा अश्वत्थामा मारा गया।
सच बोलने के लिए मशहूर युद्धिष्ठिर ने इसे अनुचित माना और कृष्ण की बात माानने से अस्वीकार कर दिया। लेकिन उन्हें कृष्ण ने अपनी समझदारी से आधा सच और आधा झूठ बोलने के लिए राजी कर लिया।
अगले दिन हुआ भी वही। अश्वत्थामा हाथी मारा गया। और युद्ध लड़ते हुए द्रोण के कान तक बात पहुंचायी गयी कि उनका बेटा अश्वत्थामा मारा गया।
कृष्ण की कुटिलता से परिचित द्रोण ने समाचार के सत्यापन के लिए युद्धिष्ठिर से पूछा कि क्या सचमुच मेरा बेटा अश्वत्थामा मारा गया ? युद्विष्ठिर ने जवाब दिया ‘जी गुरूदेव, अश्वत्थामा मारा गया। ‘ कहानी के मुताबिक युद्धिष्ठिर के इतना कहते ही कृष्ण ने जोर से शंख बजाया और गुरू द्रोण युद्धिष्ठिर के कथन का उत्तराशं - ‘लेकिन नर नहीं, हाथी‘, नहीं सुन पाए।
इस बात पर अभी भी बहस हो सकती है कि युद्धिष्ठिर ने जो कहा वो सच था या झूठ ? विश्वास ना हो तो राम से पूछिए। वह चाहें तो दोनों बातें साबित कर सकते हैं। आप सहमत हों या ना , बला से। राम कौन ? राम जेठमलानी।
खैर, भारत की पौराणिक और धार्मिक कहानियों से पता चलता है कि अपने यहंा झूठ बोलने की लंबी परंपरा है। झूठ सच नामक सिक्के का दूसरा पहलू भर है। शायद कभी झूठ का अच्छा खास बोलबाला रहा होगा, ऐसा अनुमान सच के प्रति बाद के दूराग्रह को देखकर लगाया जा सकता है।
सच के साथ जुड़ी नैतिकता को अगर थोड़ी देर के लिए स्थगित कर दें तो इस बात से असहमत होना कठिन होगा कि झूठ बोलना एक रचनाशील काम है। आपमें कल्पनाशीलता और रचनाशीलता जैसे गुण नहीं हैं तो आप झूठ नहीं बोल सकते।
बच्चे इस बात के सबसे अच्छे उदाहरण हो सकते हैं। बच्चे झूठ नहीं बोलते , तब तक जब तक कि वे बोलना सीखने में व्यस्त रहते हैं। एक बार जब वे भाषा के सामान्य अर्थ और नीहितार्थ का भेद जान लेते हैं , फिर जम कर बोलते हैं। एक बच्चा के दिमाग की तीक्ष्णता , कल्पनाशीलता और रचनाशीलता का पता इस बात से लगाया जा सकता है कि वो अपने सच और भाषा के साथ कैसा खिलवाड़ करता है।
लेकिन हम बच्चे से सच बोलने की जिद्द करते हैं। अपनी बुद्धि का डंडा चलाते हुए हर बार बच्चे का झूठ पकड़ लेते हैं और कहते हैं - ‘नहीं , झूठ नहीं। झूठ से मुझे सख़्त नफ़रत है। तुम झूठ बोलोगे और मैं पकड़ लूंगा। खबरदार जो फिर कभी झूठ बोला।‘
सच बोलने की इस जिद्द के पीछे शायद हमारे बलवादी देवताओं का और उनके समर्थकों का हाथ है। सच
के ज्यादातर पैरोकार पौराणिक कहानियों के वे क्षत्रिय राजकुमार हैं , जो भले ही बलवान हों लेकिन उनकी बुद्धि की तीक्ष्णता संदीग्ध है।
राम से पहले राजा हरिश्चंद्र की कहानी हम जानते हैं। कहानी के मुताकिब हरिश्चंद्र शायद राम के पूर्वज ही थे। हरिश्चंद्र सत्य तो बोलते थे , लेकिन उनकी सत्यता आत्मघाती था और उसमें किसी किस्म की विलक्षणता का अभाव है। उनके यहां सत्य हठ बन जाता है। हरिष्चंद्र की कहानी भोंडे ढंग से नाटकीय और भावुक है। इतना नाटकीय है कि अविश्वसनीय है। जो इंसान सपने और जीवन के फर्क को ना समझ ना पाए , उससे और क्या उम्मीद कर सकते हैं !
सत्य के प्रति राम का आग्रह भी मूलतः उनके बल का आग्रह ही था। राम को अगर वाल्मीकि , कंबन , तुलसी , और रामानंद सागर जैसे कवि कहानीकारों का साथ नहीं मिला होता तो, हमें उनके सत्य प्रेम से ज्यादा उनके बल प्रेम के बारे में पता होता।
भारतीय देवताओं में ज्यादातर बाहुबली क्षत्रिय हैं , जिनके चरित्र में हास - परिहास और जीवन के रंग का भारी अभाव है। अपने अनुभव से हम इस बात को समझ सकते हैं कि अपने बल और सामथ्र्य में अंधा विश्वास रखने वाला कभी अपनी वाक्श्क्ति पर भरोसा नहीं करता। रामायण की कहानी में कोई ऐसा अंश नहीं है जब आप राम के वाक्चातुर्य से मोहित हो जांय। संक्षेप में राम बुद्धि के नहीं बल के देवता हैं।
ब्ुद्धि वाले सारे गुण कृष्ण में थे। इसलिए कृष्ण को झूठ से कोई परेशानी नहीं है। वह झूठ बोलते भी हैं और झूठ बोलने वाले को प्रश्रय भी देते हैं।
झूठ को पाप घोषित किए जाने के पीछे इन्हीं बलवादी देवताओं के समर्थकों का हाथ है। जो भी हो, झूठ के बिना दुनियावी इंसान का काम नहीं चल सकता। हम अक्सर झूठ का सहारा ऐसी ही परिस्थितियों में लेते हैं, जहां सच हमें मुश् िकल में डाल सकता है। झूठ की इस सामाजिक उपयोगिता को हम अस्वीकार नहीं कर सकते।
लेकिन विडंबना है कि झूठ का सहारा लेकर जीने वाले आप-हम जैसे तमाम लोग झूठ और झूठ बोलने वाले को कोसने का कोई अवसर नहीं छोडते। बात-बात में यह कहना कि ‘ये झूठ है , गलत है या फिर कि फलां आदमी पर विष्वास नहीं किया जा सकता क्योंकि वो झूठ बोलता है , झूठ और झूठ बोलने वालों की सामाजिक प्रतिष्ठा में बड़ी बाधा पैदा करती है।
जो लोग सच को सर पर लेकर घूमते हैं , वे भी बगल में झूठ की गठरी दवाए रखते हैं। हमारे यहां तो लोग झूठ की खेती करने का आरोप दूसरे पर लगाते हैं , लेकिन झूठ की फसल काट कर अपना गुज़ारा चलाते हैं।
अगर हम आज के सूचना युग और सूचना समाज को देखें तो यहां एक चीज जो सबसे ज्यादा झूठ बेची या खरीदी जाती है वह है झूठ। राष्टीय अंतराष्टीय स्तर के झूठ के कुछ नमूने देखिए: श्रीलंका के किसी चट्टान पर सीता के पद चिन्ह दिखाई देते हैं। साईवेरिया में कहीं दूसरे ग्रह के अज्ञात जीव का शव मिलता है। भारत दुनिया का सबसे आदर्श लोकतंत्र है। अमेरिका दुनिया में लोकतंत्र और शांति स्थापित करना चाहता है। ओसामा बिन लादेन शहीद हो गया। कांग्रेस की सरकार भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए कटिवद्ध है। भाजपा एक राष्टवादी पार्टी है। मायावती दलितों के उत्थान के लिए काम करती है। राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनने के लायक है। करुणा की कनी ने सिनेयुग के तोरानी से 200 रूपए कर्ज लिए थे। ये इस सूचना युग और समाज के ऐसे भोंडे सत्य हैं जिन्हें जन-संचार के उपलब्ध सारे माध्यम प्रचारित प्रसारित करने में व्यस्त हैं।
समस्या इन शर्मनाक भौंडे सत्यों से नहीं हैं। सच का जाप करते हमारे लोकतांत्रिक संस्थाओं से है। विद्यालय से लेकर न्यायालय तक और सड़क से लेकर संसद तक पिछले साठ सालों में सच की पूंछ पकड़कर राजा हरिश्चंद्र की ये संतानें आज यहां तक पहुंच चुकी है।
अगर हमने झूठ को , जीवन के रास रंग को , हास परिहास को अपने सार्वजनिक संस्थानों में थोड़ी सी इज्ज़त दी होती तो हमारा सच इतना लिजलिज़ा नहीं होता।
पांडवों के पांच शिशुओं का , रात के अंधेरे में धोखे और छल से , वध करने वाला अश्वत्थामा का मारा जाना युद्धिष्ठिर के सच बोलने से ज़्यादा जरूरी था।
ये झूठ है कि झूठ बोलना पाप है। आईये थोड़ा-थोड़ा झूठ बोलते रहें , ताकि सच कहीं बेरंग ना हो जाय , सच का संज्ञान कहीं लुप्त ना हो जाय।
नहीं , हर बार झूठ बोल रहे बच्चे को टोकिए मत कि वो झूठ बोल रहा है , क्योंकि झूठ से हम सबका वास्ता है।
Monday, June 20, 2011
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