महाभारत की कई कहानियां झूठ और सच के महीन अंतर को रेखांकित करती हैं। जब गुरू द्रोण पांडवों की सेना पर कहर ढा रहे थे , उनके प्रकोप से बचने के लिए एक उपाय के बारे में सोचा गया जो झूठ पर आधारित था।
कृष्ण ने रणनीति बनाई की अगले दिन के युद्ध में अश्वत्थामा नाम के हाथी को मारा जाय और प्रचार किया जाय कि द्रोण का बेटा अश्वत्थामा मारा गया।
सच बोलने के लिए मशहूर युद्धिष्ठिर ने इसे अनुचित माना और कृष्ण की बात माानने से अस्वीकार कर दिया। लेकिन उन्हें कृष्ण ने अपनी समझदारी से आधा सच और आधा झूठ बोलने के लिए राजी कर लिया।
अगले दिन हुआ भी वही। अश्वत्थामा हाथी मारा गया। और युद्ध लड़ते हुए द्रोण के कान तक बात पहुंचायी गयी कि उनका बेटा अश्वत्थामा मारा गया।
कृष्ण की कुटिलता से परिचित द्रोण ने समाचार के सत्यापन के लिए युद्धिष्ठिर से पूछा कि क्या सचमुच मेरा बेटा अश्वत्थामा मारा गया ? युद्विष्ठिर ने जवाब दिया ‘जी गुरूदेव, अश्वत्थामा मारा गया। ‘ कहानी के मुताबिक युद्धिष्ठिर के इतना कहते ही कृष्ण ने जोर से शंख बजाया और गुरू द्रोण युद्धिष्ठिर के कथन का उत्तराशं - ‘लेकिन नर नहीं, हाथी‘, नहीं सुन पाए।
इस बात पर अभी भी बहस हो सकती है कि युद्धिष्ठिर ने जो कहा वो सच था या झूठ ? विश्वास ना हो तो राम से पूछिए। वह चाहें तो दोनों बातें साबित कर सकते हैं। आप सहमत हों या ना , बला से। राम कौन ? राम जेठमलानी।
खैर, भारत की पौराणिक और धार्मिक कहानियों से पता चलता है कि अपने यहंा झूठ बोलने की लंबी परंपरा है। झूठ सच नामक सिक्के का दूसरा पहलू भर है। शायद कभी झूठ का अच्छा खास बोलबाला रहा होगा, ऐसा अनुमान सच के प्रति बाद के दूराग्रह को देखकर लगाया जा सकता है।
सच के साथ जुड़ी नैतिकता को अगर थोड़ी देर के लिए स्थगित कर दें तो इस बात से असहमत होना कठिन होगा कि झूठ बोलना एक रचनाशील काम है। आपमें कल्पनाशीलता और रचनाशीलता जैसे गुण नहीं हैं तो आप झूठ नहीं बोल सकते।
बच्चे इस बात के सबसे अच्छे उदाहरण हो सकते हैं। बच्चे झूठ नहीं बोलते , तब तक जब तक कि वे बोलना सीखने में व्यस्त रहते हैं। एक बार जब वे भाषा के सामान्य अर्थ और नीहितार्थ का भेद जान लेते हैं , फिर जम कर बोलते हैं। एक बच्चा के दिमाग की तीक्ष्णता , कल्पनाशीलता और रचनाशीलता का पता इस बात से लगाया जा सकता है कि वो अपने सच और भाषा के साथ कैसा खिलवाड़ करता है।
लेकिन हम बच्चे से सच बोलने की जिद्द करते हैं। अपनी बुद्धि का डंडा चलाते हुए हर बार बच्चे का झूठ पकड़ लेते हैं और कहते हैं - ‘नहीं , झूठ नहीं। झूठ से मुझे सख़्त नफ़रत है। तुम झूठ बोलोगे और मैं पकड़ लूंगा। खबरदार जो फिर कभी झूठ बोला।‘
सच बोलने की इस जिद्द के पीछे शायद हमारे बलवादी देवताओं का और उनके समर्थकों का हाथ है। सच
के ज्यादातर पैरोकार पौराणिक कहानियों के वे क्षत्रिय राजकुमार हैं , जो भले ही बलवान हों लेकिन उनकी बुद्धि की तीक्ष्णता संदीग्ध है।
राम से पहले राजा हरिश्चंद्र की कहानी हम जानते हैं। कहानी के मुताकिब हरिश्चंद्र शायद राम के पूर्वज ही थे। हरिश्चंद्र सत्य तो बोलते थे , लेकिन उनकी सत्यता आत्मघाती था और उसमें किसी किस्म की विलक्षणता का अभाव है। उनके यहां सत्य हठ बन जाता है। हरिष्चंद्र की कहानी भोंडे ढंग से नाटकीय और भावुक है। इतना नाटकीय है कि अविश्वसनीय है। जो इंसान सपने और जीवन के फर्क को ना समझ ना पाए , उससे और क्या उम्मीद कर सकते हैं !
सत्य के प्रति राम का आग्रह भी मूलतः उनके बल का आग्रह ही था। राम को अगर वाल्मीकि , कंबन , तुलसी , और रामानंद सागर जैसे कवि कहानीकारों का साथ नहीं मिला होता तो, हमें उनके सत्य प्रेम से ज्यादा उनके बल प्रेम के बारे में पता होता।
भारतीय देवताओं में ज्यादातर बाहुबली क्षत्रिय हैं , जिनके चरित्र में हास - परिहास और जीवन के रंग का भारी अभाव है। अपने अनुभव से हम इस बात को समझ सकते हैं कि अपने बल और सामथ्र्य में अंधा विश्वास रखने वाला कभी अपनी वाक्श्क्ति पर भरोसा नहीं करता। रामायण की कहानी में कोई ऐसा अंश नहीं है जब आप राम के वाक्चातुर्य से मोहित हो जांय। संक्षेप में राम बुद्धि के नहीं बल के देवता हैं।
ब्ुद्धि वाले सारे गुण कृष्ण में थे। इसलिए कृष्ण को झूठ से कोई परेशानी नहीं है। वह झूठ बोलते भी हैं और झूठ बोलने वाले को प्रश्रय भी देते हैं।
झूठ को पाप घोषित किए जाने के पीछे इन्हीं बलवादी देवताओं के समर्थकों का हाथ है। जो भी हो, झूठ के बिना दुनियावी इंसान का काम नहीं चल सकता। हम अक्सर झूठ का सहारा ऐसी ही परिस्थितियों में लेते हैं, जहां सच हमें मुश् िकल में डाल सकता है। झूठ की इस सामाजिक उपयोगिता को हम अस्वीकार नहीं कर सकते।
लेकिन विडंबना है कि झूठ का सहारा लेकर जीने वाले आप-हम जैसे तमाम लोग झूठ और झूठ बोलने वाले को कोसने का कोई अवसर नहीं छोडते। बात-बात में यह कहना कि ‘ये झूठ है , गलत है या फिर कि फलां आदमी पर विष्वास नहीं किया जा सकता क्योंकि वो झूठ बोलता है , झूठ और झूठ बोलने वालों की सामाजिक प्रतिष्ठा में बड़ी बाधा पैदा करती है।
जो लोग सच को सर पर लेकर घूमते हैं , वे भी बगल में झूठ की गठरी दवाए रखते हैं। हमारे यहां तो लोग झूठ की खेती करने का आरोप दूसरे पर लगाते हैं , लेकिन झूठ की फसल काट कर अपना गुज़ारा चलाते हैं।
अगर हम आज के सूचना युग और सूचना समाज को देखें तो यहां एक चीज जो सबसे ज्यादा झूठ बेची या खरीदी जाती है वह है झूठ। राष्टीय अंतराष्टीय स्तर के झूठ के कुछ नमूने देखिए: श्रीलंका के किसी चट्टान पर सीता के पद चिन्ह दिखाई देते हैं। साईवेरिया में कहीं दूसरे ग्रह के अज्ञात जीव का शव मिलता है। भारत दुनिया का सबसे आदर्श लोकतंत्र है। अमेरिका दुनिया में लोकतंत्र और शांति स्थापित करना चाहता है। ओसामा बिन लादेन शहीद हो गया। कांग्रेस की सरकार भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए कटिवद्ध है। भाजपा एक राष्टवादी पार्टी है। मायावती दलितों के उत्थान के लिए काम करती है। राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनने के लायक है। करुणा की कनी ने सिनेयुग के तोरानी से 200 रूपए कर्ज लिए थे। ये इस सूचना युग और समाज के ऐसे भोंडे सत्य हैं जिन्हें जन-संचार के उपलब्ध सारे माध्यम प्रचारित प्रसारित करने में व्यस्त हैं।
समस्या इन शर्मनाक भौंडे सत्यों से नहीं हैं। सच का जाप करते हमारे लोकतांत्रिक संस्थाओं से है। विद्यालय से लेकर न्यायालय तक और सड़क से लेकर संसद तक पिछले साठ सालों में सच की पूंछ पकड़कर राजा हरिश्चंद्र की ये संतानें आज यहां तक पहुंच चुकी है।
अगर हमने झूठ को , जीवन के रास रंग को , हास परिहास को अपने सार्वजनिक संस्थानों में थोड़ी सी इज्ज़त दी होती तो हमारा सच इतना लिजलिज़ा नहीं होता।
पांडवों के पांच शिशुओं का , रात के अंधेरे में धोखे और छल से , वध करने वाला अश्वत्थामा का मारा जाना युद्धिष्ठिर के सच बोलने से ज़्यादा जरूरी था।
ये झूठ है कि झूठ बोलना पाप है। आईये थोड़ा-थोड़ा झूठ बोलते रहें , ताकि सच कहीं बेरंग ना हो जाय , सच का संज्ञान कहीं लुप्त ना हो जाय।
नहीं , हर बार झूठ बोल रहे बच्चे को टोकिए मत कि वो झूठ बोल रहा है , क्योंकि झूठ से हम सबका वास्ता है।
Tuesday, June 21, 2011
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7 comments:
Please Read Rs. 200 Cr. Instead Rs. 200
got chance to read a fresh idea after a long time. Thanks. I had believe that shared lie become myth and shared myth become religion. Shashi
@Shashi, thank you for reading the blog and droping words of encouragement.
Well Said shaym ji.
Shyamanandjee,
It is time somebody said it all. Congratulations ! I am, though, reminded of the words said by Plato in Republic aeons ago......."Truth is virtue uncontaminated by passion'. Wanted to write a detailed response but the constraint of time does not permit.Congratulations, again !!! This counts for strong black coffee !!!
well said...hope in a era of crisis of good thoughts, some fresh ideas and views will be brougt up through your blog..
Shandilya Upadhyay and Shanker Arnimesh, Thank You so very much. A word of appreciation matters a lot for a writer/blogger!
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