खुज़ली एक बीमारी है। कुछ लोगों के लिए एक सुखद बीमारी। आखों पर पलकों का आधा परदा डालकर खुजलाते रहने वाले ये लोग इस बात से वाकिफ़ मगर बेपरवाह होते हैं कि इनकी ये मीठी खुजलाहट जल्द ही जलन में बदलने वाली है।
अभी कल तक हमारे समाज में कुछ लोग ऐसे थे, जो आपको टोकते, आगाह करते कि खुजली एक घटिया बीमारी है, कि खुजलाना सुख बटोरने का कोई तरीका नहीं है।
लेकिन अचानक हमारा समाज इतना शिष्ट और शालीन हो गया है कि आज आपको अपने किसी काम या कदम पर कोई रोकने टोकने वाला नहीं मिलेगा। बल्कि आप ऐसे लोगों से अपने को हमेशा घिरा पाएंगे जो आपको आपके हर एक काम पर प्रोत्साहन देते मिलेंगे, चाहे आप सबके सामने आंखें बंदकर खुजली ही क्यों ना रहे हों। वे कहेंगे, जी हां, जहां सुख इतना दुर्लभ हो, वहां अगर कोई खुजलाते हुए ही सुख बटोर रहा है तो वह क्या ही अच्छा काम कर रहा है!
वर्तमान कला और उसकी समीक्षा परिदश्य को देखकर तो कम से कम ऐसा ही लगता है।
अभी पिछले से पिछले हफता एक फिल्म रिलीज़ हुई ‘डेल्ही बेली‘। इस फिल्म को लेकर जो उत्तेजना सिनेमा समीक्षकों के बीच दिखी वह चैंकाने वाली भी है और काफी रहस्यमयी भी। सच पूछिए तो, इन समीक्षकों में इस तरह के जोश-खरोश देखकर भ्रम होने लगता है कि कहीं फिल्म समीक्षा भी प्रायोजित कार्यक्रम का एक अंग तो नहीं बन गयी है?
यह फिल्म फिल्म नितिन बेरी (कुणाल राय कपूर) की टट्टी और सोमयाजुलू के हीरे की उलटफेर के आस पास घूमती है। नहीं, कहानी के विस्त्ृत व्यौरे में जाने की ज़रूरत नहीं है। क्योंकि अगर आपने देख ली है तो, और अगर नहीं देखी है तो, कहने लायक इस कहानी में कुछ है नहीं। और, वैसे भी हम फिल्म पर बात कर रहे हैं इसकी कहानी पर नहीं।
फिल्म में सबसे पहले तो यह स्पष्ट नहीं है कि ब्लादिमिर हीरे का पैकेट जो उसे सोमयाजुलू तक पहुंचाना है, सोनिया को क्यांे देता है? सोनिया ब्लादिमिर और सोमयाजुलू के लिए काम करती है, इसकी कोई भनक फिल्म आपको लगने नहीं देती। अगर मान लेते हैं कि सोनिया ब्लादिमिर के लिए काम करती भी है तो वह इतने महत्वपर्ण कन्साईनमेंट अपने एक ऐसे लापरवाह दोस्त को कैसे दे सकती है, जिसे वो इतने अच्छी तरह से जानती है कि उसके साथ सोती है, और उससे शादी करने वाली है।
आगे हम देखते हैं कि सुबह का वक्त है और तीन दोस्त घोड़े बेच कर सो रहे हैं। नितिन बेरी (कुणाल राय कपूर) तो इतनी बेसूधी सो रहा है कि उसकी चडढी नीचे सड़क गयी है और उसके पिछवाड़े का ऊपरी भाग दिखाई दे रहा है। एक सोते हुए आदमी का चडढी से झांकता पिछवाड़ा सिनेमा के लेखक और निर्देशक को इतना लुभावना लगा कि एक ही सीन में कम से कम इसके तीन शाॅट हैं।
निस्संदेह, दर्शकों के बीच से कुछ दबी हुई सी हंसी भी सुनाई देती है आपको। नहीं, आप चैंक कर दाएं बाएं या पीछे मुड़कर अंधेरे में इन दबकर हंसने वाले को पहचानने की कोशिश नहीं कर सकते, कि कौन हैं ये लोग जिन्हें आदमी के शरीर के किसी विशेष भाग को देखकर हंसी आ रही है! चारों तरफ अंधेरा है, और हर दर्शक चेहराहीन है।
चलिए, आगे बढ़ते हैं। दरवाजे पर खट-खट की आवाज़ होती है। तीनों में से कोई उठने को तैयार नहीं है। अंत में तिशा (इमरान खान) उठता है और वह अपने दोनों दोस्तों के पिछवाड़े पर एक एक लात लगाता है कि वे क्यों नहीं उठे, कि उसे क्यों उठना पड़ा!
तिशा की लगायी गयी लात खीज़ में कम मुहब्बत में लगायी गयी ज्यादा है, इतना तो मैं भी समझता हूं। लेकिन उसने लात लगायी क्यों? मुहब्बत जाहिर करने का यह कौन सा तरीका है?
फिल्म के लेखक-निर्देशक ने शायद सोचा होगा कि इससे यह साबित हो जाएगा कि तिशा फिल्म का हिरो है। लेकिन इसकी क्या ज़्ारूरत थी?
फिल्म के निर्माता आमिर खान हैं, और उनमें उनका भांजा इमरान काम कर रहा है। फिर भी किसी को ये उम्मीद कैसी करनी चाहिए कि वीर दास या कुणाल राय कपूर या कोई और फिल्म का नायक हो सकता था!
नहीं ठहरिये, मुझे याद आ रहा है कि दर्शकों को फिल्म का यह सिक्वेंस भी अच्छा लगा था। वे हंसे थे, इतना तो मैं निश्चियपूर्वक कह सकता हूं। क्यों हंसे थे, यह मैं नहीं जानता।
परंत,ु मैं इतना जानता हूं कि इस फिल्म के आस पास गुजरे जमाने के भांड की तरह शोर मचाने वाले सिनेमा-समीक्षकों को भी यह सिक्वेंस अच्छा लगा होगा। दर्शकों से तो नहीं, पर समीक्षकों से यह पूछने का हक तो मैं रखता हूं कि उनसे पूछूं, इस सिक्वेंस पर आप हंस थे, तो क्यों? और नहीं हसे थे, तो इसके बारे लिखा क्यों नहीं।
खीज़कर पलटवार करते हुए कोई यह कह सकता है कि दोस्तों के बीच ऐसा होता है। मैं भी मानता हूं कि ऐसा होता है। हमारी देखी और जिअी दोस्ती में भी ऐसा हुआ है। हमने दोस्तों को मारा है तो उससे मार खाया भी है।
मगर नहीं। फिल्म में ऐसा कुछ नहीं होता है। तिशा अपने दोस्तों के पिछवाड़े पर लात मारता है लेकिन उसके पिछवाड़े की तरफ कोई आंख उठाकर भी नहीं देखता।
वर्चस्व की लड़ाई कहां तक पैठ चुकी है! पति-पत्नि के संबंध पदरे पर आज भी तिरछा ही दिखाया जाता है। अभी पीछे की कुछ हिंद फिल्मों में नायक के दोस्त, दोस्त कम चापलूस ज्यादा नज़र आते हैं। ये नहीं जानते, जिन्हें ये दोस्त समझ रहे हैं, वे दोस्त नहीं चापलूस हैं। दास्ेती से ताल्लुक रखने वाली पहले की फिल्मों में ऐसा नहीं होता था। वहां रिश्ते में दोनों या सब बराबर होते थे।
इस फिल्म में तिशा बाकी के अपने दोस्तों से विशिष्ट कैसे है, यह स्पष्ट नहीं है। वीरदास और कुणाल राय कपूर का एक जैसा दिखाया गया है, जबकि तिशा इनके साथ , लेकिन इनसे अलग रूप में पेश किया गया है।
‘डेल्ही बेली‘ एक खराब फिल्म है यह साबित करने की इज़ाजत मुझे अपने ब्लाॅग का फारमेट नहीं देता। हम दर्शकांे पर भी दोष नहीं देते कि उनकी अभिरूचि में ऐसा पतन क्यों देखने को मिलता है? लेकिन हम अपने समीक्षकों से तो यह पूछ सकते हैं कि प्रशंशा के पुल बांधने से पहले वे फिल्मों की बारीकियांे की ओर ईशारा क्यों नहीं करते?
संभव है कि वे फिल्मों के इन कमज़ोर पक्षों के बारे में जानते हों, पर किसी दबाव में ऐसा कहने से हिचकते हों?
स्ंाभव यह भी है वे इन भेदों को नहीं जानते!
वेवज़ह गाली देने वाले इंसान को हम ज़्यादा साहसी नहीं कहते। फिल्म में वीरदास का गाली या इससे संबंधित शब्द बोलना हर बार बेतुका है।
आपने गौर किया, फिल्म में इमरान एक बार भी इस तरह के शब्द का इस्तेमाल नहीं करता। नहीं ये अच्छी बात नहीं है। फिल्म में जो दो सबसे व्यस्क दृष्य हैं, उनमें भी इमरान के इमेज को बचाने की शर्मनाक कोशिश हुई है। दोनों ही दृष्यों में फिल्म की नायिकाओं ने हिम्मत दिखाई है, और फायदा ईमरान को मिला।
और ये पांचवी फेल टाईप का गीत ‘‘भाग डीकेबोस‘‘!
ये सब क्या है ?
लोग ऐसी चीजें पसंद कर रहे हैं, क्योंकि उनकी आंखें और कानें सप्ताह भर से खुजला रहे हैं। कुछ भी सुनाईये, कुछ भी दिखाईये, उन्हें पसंद आएगा। थोड़ा समीक्षकों का थोड़ा शोर शराबा हो जाय तो कहना ही क्या!
आप इससे अन्यथा सोचते हों तो बताएं।
श्याम आनंद झा
Monday, July 18, 2011
Friday, July 8, 2011
गायब ही होता जा रहा है विनयशील प्रेम
सिगमंड फ्रायड के ज़्यादातर विचारों पर उनके मरने के बाद उनके चेले या फिर उनके चेले के चेलों ने कुछ गंभीर सवाल उठाये। पश्चिम के आधुनिक क्रांतिकारी विचारकों और दार्शनिकों को फूटी आंख न पसंद करने वाले भारतीय विश्वविद्यालयी बुद्धिजीवियों के बीच न तो फ्रायड के विचारों की कोई कद्र है और न उन सवालों की, जो उठे थे। यहां यह बस मान लिया गया है कि फ्रायड कोई झक्की सा मनोचिकित्सक था, जिसने सेक्स-वेक्स के बारे में कुछ बातें की थीं।
प्रश्न उठाए गए विषयों या विचारों को भारत में अशुभ माना जाता है। जैसे ही किसी भी मौलिक और लोकप्रिय शोध पर प्रश्न उठे, उत्तेजना में आकर हमारे देशी विद्वान उन विचारों को बेकार और बेमतलब मानने लगते हैं।
माक्र्स , डार्विन , फ्रायड जैसे युगांतकारी विचारकों के बारे में आज लगभग यही रवैया देखा जाता है। नैतिकता की तेल पिलाई हुई लाठी लेकर वे कहते नज़र आएंगे, ‘कौन, माक्र्स और कौन डार्विन ? और, फ्रायड, उसकी तो बात ही मत कीजिए। वह क्या बोलेगा, उसके तो अपनी साली के साथ ही अनैतिक संबंध थे।‘
लेकिन आम जनजीवन में प्रचलित सेक्स-व्यवहार और सेक्स संबंधित अपराधों को देखकर लगता है कि क़ब्र में गुजारे पिछले सत्तर साल के समय में, फ्रायड महोदय ने ज्यादा समय अपने लिखे और सोचे पर गर्व ही किया होगा। वह उन लोगों पर कभी-कभी व्यंग्य से मुस्कुराते भी रहे होंगे , जो उन्हें बिना पढ़े या जाने खारिज़ करने के फिराक़ में रहते हैं।
और, इन दिनों, दोमिनीक स्टाªस कान्ह का मामला सामने आने के बाद से तो वह फिर से ठहाका मार कर हंस रहे होंगे। ठहाका मारकर हंसने के ऐसे कई अवसर उन्हें अक्सर ही मिलते रहे हैं। कभी बिल क्लिटंन के सौजन्य से तो कभी नारायदत्त तिवारी के सौजन्य से।
डीएसके पर सोफीटेल होटल की एक परिचायिका ने आरोप लगाया कि उन्होंने उसके साथ बलात् सेक्स करने की कोशिश की। डीएसके पर ऐसे आरोप पहले भी लगे हैं। अभी त्रिसतेन बनों (अगर उच्चारण ग़लत हो तो माफ करें, क्योंकि फ्रंासीसी नाम और शब्द का उच्चारण एक गैर फ्रंासीसी अक्सर गलत ही करता है) नाम की लेखिका ने आरोप लगाया है कि एक साक्षात्कार के दौरान डीएसके उन पर भी टूट पड़े थे।
महिलाओं पर टूट पड़ने की अपनी आदिम आदत से डीएसके खुद भी परेशान हांेगे, मगर करें क्या? संभव है उनकी कुछ और शिकायत सामने आए। और यह भी संभव है कि उन आरोपों से फं्रास में उनकी लोकप्रियता थोड़ी और बढ़ जाय। संभव यह भी है कि इन सारे के सारे आरोपों का वही हश्र हो, सोफीटेल की आया के आरोप का हुआ।
न्यायालय में किसी अपराध का साबित होना (या ना होना) और दूसरी बहुत सी गैरज़रूरी बातों पर निर्भर करता है, जैसे, वकील कौन है, जज कौन है, या फिर आरोपी कौन है और अभियुक्त कौन। अपराध और आरोप की मंशा का पीछा करते हुए चालाक वकील एक ऐसी सामानांतर मगर भा्रमक स्थिति पैदा करते हैं कि अपराध और आरोप हाशिए पर चले जाते हैं , और न्याय गरीब बुढिए के बेलगाम बछरे की तरह पूंछ उठाकर इधर उधर दौड़ता रहता है।
डीएसके के मामले में भी ऐसा ही हुआ। अदालत में होटल की आया की मंशा पर ज्यादा बहस हुई उसे पहंुचे ज़ख्म पर कम। इस बात पर ज़्यादा शोर हुआ कि परिचायिका का चरित्र ढीला है। लेकिन डीएसके पर लगे पुराने आरोप को इस केस से अलग रखा गया।
खैर, ये ज्यादा पेंचिदा मामला है। इस मुददे पर शायद आप मुझसे बेहतर बातें कह सकते हैं। बहरहाल, मैं फ्रायड की बात कर रहा था कि वह इन दिनों बहुत खुश होंगे।
फ्रायड खुश होंगे कि देखो ‘मेरा यह मानना कि काम आवेग मनुष्य की जीवन-दिशा को प्रभावित करने वाला सबसे प्राथमिक और प्रबल आवेग है, कि यह आवेग इतना प्रबल है कि मनुष्य उसके वशीभूत होकर समय और स्वंय के होने तक का बोध खो देता है, एक बार फिर, इतने योग्य उदाहरण के साथ खड़ा उतरा है।
फ्रायड का मानना है कि मनुष्य के इस प्रबल आवेग के खतरे से निबटने के लिए ही सभ्यता और संबंध का सारा ताना बाना बुना गया, कि यह आवेग इतना प्रबल है कि लाख दबाने के बावजूद यह हमारे स्वप्न के रूप में प्रतिदिन प्रतिबिंबित होता है।
स्वपन की अर्थ-विवृति पर ढे़र काम हुए हैं। लेकिन सेक्स संबंधी अपराध के विश्लेषण के जरिए हम समाज, अपराधी और पीडि़त की सामाजिक हैसियत और उनके बीच के सामाजिक संबंध के कुछ दिलचस्प पहलू को खोल सकते हैं।
डीएसके एक बेहद सफल, स्वस्थ और आकर्षक व्यक्ति हैं। असफलता, अभाव, अस्वीकार जैसे अवधारणाओं से ये अवगत नहीं होते। अपनी सफलता और स्वीकार से ये इतने अभिभूत होते हैं कि उन्हें किसी की परवाह नहीं होती। अक्सर यह देखने को मिलता है कि ऐसे लोग अक्सर अपनी हैसियत के उद्दंड घोड़े पर बैठकर, अपनी लालसा तृप्ति के लिए कुछ भी कर सकते हैं , कहीं तक जा सकते हैं।
डीएसके के लिए एक आया की देह के लिए आया की स्वीकृति लेना जरूरी नहीं है। उन्हें जब जो देह चाहिए सो चाहिए। चैबीसों घंटे खुले माॅल में बिक रही वस्तु की तरह। जाईये और उठाईये। दुकानदार से ये पूछने की जरूरत क्या है कि ये सामान हम खरीदना चाहते हैं , बेचोगे क्या?
उन्हें रात के तीसरे पहर में पिज्ज़ा चाहिए। पिज़्जा उपलब्ध है। उन्हें अगले बीस मिनट बाद हज़ारों किलोमीटर दूर किसी से मिलने जाना है। वायुयान उपलब्ध है। उन्हें अपनी पत्नी (या पति) से अगले दिन तलाक चाहिए। लाॅ फर्म तैयार है।
फिर एक प्रवासी आया की देह की क्या बिसात! उठाईये। कीमत चुकाईये। बस। एक तरह से डीएसके गुजरे जमाने में स्त्रियों का अपहरण करनेवाले योद्धा का उत्तरआधुनिक संस्करण हैं। आवेगमय प्राणी। विवेकहीन मनुष्य।
(शायद) फ्रायड के मुताबिक आकर्षक स्त्रियों के प्रति आवेगी डीएसके का हमलावर रुख स्वाभाविक है। डीएसके जैसा आदमी अपने आवेग में इसी तरह का व्यवहार करेगा। भावुक प्रेम का शाईराना इज़हार की उम्मीद डीएसके से बेकार है।
कुछ लोग जो डीएसके नहीं हैं, जो अपने कैरियर में खम ठोककर नहीं, धोखे से, किसी चालाकी से सफल हुए हैं, उनके प्रेम में भी आपको एक तरह की चालाकी दिखेगी। वे बल का नहीं छल का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे लोग झांसा देने वाले लोग होते हैं।
मुझे मरहूम नीरज ग्रोवर की याद आ रही है। मारिया सुसाईराज ने बताया कि नीरज ने उसे झांसा दिया गया कि देह के बदले वे उसे अभिनय के बेहतर अवसर मुहैया कराते। भारत में यौन शोषण के ऐसे प्रपंची किस्से हजा़रों हज़ार मिलेंगे।
भारत या दुनिया भर के दूसरे पारंपरिक समाज व्यक्ति को प्रपंची और दंभी होने का अवसर नहीं देता था। लेकिन उत्तरआधुनिक समाज में प्रपंच और दंभ दोनों विशेष व्यक्तिगत गुण बन गए हैं।
विनयशील प्रेम ना सिर्फ हमारे सिनेमा के पर्दो से, बल्कि समाज से भी गायब होता जा रहा है। ये कोई चिंता की बात है भी! मुझे नहीं पता।
प्रश्न उठाए गए विषयों या विचारों को भारत में अशुभ माना जाता है। जैसे ही किसी भी मौलिक और लोकप्रिय शोध पर प्रश्न उठे, उत्तेजना में आकर हमारे देशी विद्वान उन विचारों को बेकार और बेमतलब मानने लगते हैं।
माक्र्स , डार्विन , फ्रायड जैसे युगांतकारी विचारकों के बारे में आज लगभग यही रवैया देखा जाता है। नैतिकता की तेल पिलाई हुई लाठी लेकर वे कहते नज़र आएंगे, ‘कौन, माक्र्स और कौन डार्विन ? और, फ्रायड, उसकी तो बात ही मत कीजिए। वह क्या बोलेगा, उसके तो अपनी साली के साथ ही अनैतिक संबंध थे।‘
लेकिन आम जनजीवन में प्रचलित सेक्स-व्यवहार और सेक्स संबंधित अपराधों को देखकर लगता है कि क़ब्र में गुजारे पिछले सत्तर साल के समय में, फ्रायड महोदय ने ज्यादा समय अपने लिखे और सोचे पर गर्व ही किया होगा। वह उन लोगों पर कभी-कभी व्यंग्य से मुस्कुराते भी रहे होंगे , जो उन्हें बिना पढ़े या जाने खारिज़ करने के फिराक़ में रहते हैं।
और, इन दिनों, दोमिनीक स्टाªस कान्ह का मामला सामने आने के बाद से तो वह फिर से ठहाका मार कर हंस रहे होंगे। ठहाका मारकर हंसने के ऐसे कई अवसर उन्हें अक्सर ही मिलते रहे हैं। कभी बिल क्लिटंन के सौजन्य से तो कभी नारायदत्त तिवारी के सौजन्य से।
डीएसके पर सोफीटेल होटल की एक परिचायिका ने आरोप लगाया कि उन्होंने उसके साथ बलात् सेक्स करने की कोशिश की। डीएसके पर ऐसे आरोप पहले भी लगे हैं। अभी त्रिसतेन बनों (अगर उच्चारण ग़लत हो तो माफ करें, क्योंकि फ्रंासीसी नाम और शब्द का उच्चारण एक गैर फ्रंासीसी अक्सर गलत ही करता है) नाम की लेखिका ने आरोप लगाया है कि एक साक्षात्कार के दौरान डीएसके उन पर भी टूट पड़े थे।
महिलाओं पर टूट पड़ने की अपनी आदिम आदत से डीएसके खुद भी परेशान हांेगे, मगर करें क्या? संभव है उनकी कुछ और शिकायत सामने आए। और यह भी संभव है कि उन आरोपों से फं्रास में उनकी लोकप्रियता थोड़ी और बढ़ जाय। संभव यह भी है कि इन सारे के सारे आरोपों का वही हश्र हो, सोफीटेल की आया के आरोप का हुआ।
न्यायालय में किसी अपराध का साबित होना (या ना होना) और दूसरी बहुत सी गैरज़रूरी बातों पर निर्भर करता है, जैसे, वकील कौन है, जज कौन है, या फिर आरोपी कौन है और अभियुक्त कौन। अपराध और आरोप की मंशा का पीछा करते हुए चालाक वकील एक ऐसी सामानांतर मगर भा्रमक स्थिति पैदा करते हैं कि अपराध और आरोप हाशिए पर चले जाते हैं , और न्याय गरीब बुढिए के बेलगाम बछरे की तरह पूंछ उठाकर इधर उधर दौड़ता रहता है।
डीएसके के मामले में भी ऐसा ही हुआ। अदालत में होटल की आया की मंशा पर ज्यादा बहस हुई उसे पहंुचे ज़ख्म पर कम। इस बात पर ज़्यादा शोर हुआ कि परिचायिका का चरित्र ढीला है। लेकिन डीएसके पर लगे पुराने आरोप को इस केस से अलग रखा गया।
खैर, ये ज्यादा पेंचिदा मामला है। इस मुददे पर शायद आप मुझसे बेहतर बातें कह सकते हैं। बहरहाल, मैं फ्रायड की बात कर रहा था कि वह इन दिनों बहुत खुश होंगे।
फ्रायड खुश होंगे कि देखो ‘मेरा यह मानना कि काम आवेग मनुष्य की जीवन-दिशा को प्रभावित करने वाला सबसे प्राथमिक और प्रबल आवेग है, कि यह आवेग इतना प्रबल है कि मनुष्य उसके वशीभूत होकर समय और स्वंय के होने तक का बोध खो देता है, एक बार फिर, इतने योग्य उदाहरण के साथ खड़ा उतरा है।
फ्रायड का मानना है कि मनुष्य के इस प्रबल आवेग के खतरे से निबटने के लिए ही सभ्यता और संबंध का सारा ताना बाना बुना गया, कि यह आवेग इतना प्रबल है कि लाख दबाने के बावजूद यह हमारे स्वप्न के रूप में प्रतिदिन प्रतिबिंबित होता है।
स्वपन की अर्थ-विवृति पर ढे़र काम हुए हैं। लेकिन सेक्स संबंधी अपराध के विश्लेषण के जरिए हम समाज, अपराधी और पीडि़त की सामाजिक हैसियत और उनके बीच के सामाजिक संबंध के कुछ दिलचस्प पहलू को खोल सकते हैं।
डीएसके एक बेहद सफल, स्वस्थ और आकर्षक व्यक्ति हैं। असफलता, अभाव, अस्वीकार जैसे अवधारणाओं से ये अवगत नहीं होते। अपनी सफलता और स्वीकार से ये इतने अभिभूत होते हैं कि उन्हें किसी की परवाह नहीं होती। अक्सर यह देखने को मिलता है कि ऐसे लोग अक्सर अपनी हैसियत के उद्दंड घोड़े पर बैठकर, अपनी लालसा तृप्ति के लिए कुछ भी कर सकते हैं , कहीं तक जा सकते हैं।
डीएसके के लिए एक आया की देह के लिए आया की स्वीकृति लेना जरूरी नहीं है। उन्हें जब जो देह चाहिए सो चाहिए। चैबीसों घंटे खुले माॅल में बिक रही वस्तु की तरह। जाईये और उठाईये। दुकानदार से ये पूछने की जरूरत क्या है कि ये सामान हम खरीदना चाहते हैं , बेचोगे क्या?
उन्हें रात के तीसरे पहर में पिज्ज़ा चाहिए। पिज़्जा उपलब्ध है। उन्हें अगले बीस मिनट बाद हज़ारों किलोमीटर दूर किसी से मिलने जाना है। वायुयान उपलब्ध है। उन्हें अपनी पत्नी (या पति) से अगले दिन तलाक चाहिए। लाॅ फर्म तैयार है।
फिर एक प्रवासी आया की देह की क्या बिसात! उठाईये। कीमत चुकाईये। बस। एक तरह से डीएसके गुजरे जमाने में स्त्रियों का अपहरण करनेवाले योद्धा का उत्तरआधुनिक संस्करण हैं। आवेगमय प्राणी। विवेकहीन मनुष्य।
(शायद) फ्रायड के मुताबिक आकर्षक स्त्रियों के प्रति आवेगी डीएसके का हमलावर रुख स्वाभाविक है। डीएसके जैसा आदमी अपने आवेग में इसी तरह का व्यवहार करेगा। भावुक प्रेम का शाईराना इज़हार की उम्मीद डीएसके से बेकार है।
कुछ लोग जो डीएसके नहीं हैं, जो अपने कैरियर में खम ठोककर नहीं, धोखे से, किसी चालाकी से सफल हुए हैं, उनके प्रेम में भी आपको एक तरह की चालाकी दिखेगी। वे बल का नहीं छल का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे लोग झांसा देने वाले लोग होते हैं।
मुझे मरहूम नीरज ग्रोवर की याद आ रही है। मारिया सुसाईराज ने बताया कि नीरज ने उसे झांसा दिया गया कि देह के बदले वे उसे अभिनय के बेहतर अवसर मुहैया कराते। भारत में यौन शोषण के ऐसे प्रपंची किस्से हजा़रों हज़ार मिलेंगे।
भारत या दुनिया भर के दूसरे पारंपरिक समाज व्यक्ति को प्रपंची और दंभी होने का अवसर नहीं देता था। लेकिन उत्तरआधुनिक समाज में प्रपंच और दंभ दोनों विशेष व्यक्तिगत गुण बन गए हैं।
विनयशील प्रेम ना सिर्फ हमारे सिनेमा के पर्दो से, बल्कि समाज से भी गायब होता जा रहा है। ये कोई चिंता की बात है भी! मुझे नहीं पता।
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