Friday, July 8, 2011

गायब ही होता जा रहा है विनयशील प्रेम

सिगमंड फ्रायड के ज़्यादातर विचारों पर उनके मरने के बाद उनके चेले या फिर उनके चेले के चेलों ने कुछ गंभीर सवाल उठाये। पश्चिम के आधुनिक क्रांतिकारी विचारकों और दार्शनिकों को फूटी आंख न पसंद करने वाले भारतीय विश्वविद्यालयी बुद्धिजीवियों के बीच न तो फ्रायड के विचारों की कोई कद्र है और न उन सवालों की, जो उठे थे। यहां यह बस मान लिया गया है कि फ्रायड कोई झक्की सा मनोचिकित्सक था, जिसने सेक्स-वेक्स के बारे में कुछ बातें की थीं।

प्रश्न उठाए गए विषयों या विचारों को भारत में अशुभ माना जाता है। जैसे ही किसी भी मौलिक और लोकप्रिय शोध पर प्रश्न उठे, उत्तेजना में आकर हमारे देशी विद्वान उन विचारों को बेकार और बेमतलब मानने लगते हैं।

माक्र्स , डार्विन , फ्रायड जैसे युगांतकारी विचारकों के बारे में आज लगभग यही रवैया देखा जाता है। नैतिकता की तेल पिलाई हुई लाठी लेकर वे कहते नज़र आएंगे, ‘कौन, माक्र्स और कौन डार्विन ? और, फ्रायड, उसकी तो बात ही मत कीजिए। वह क्या बोलेगा, उसके तो अपनी साली के साथ ही अनैतिक संबंध थे।‘

लेकिन आम जनजीवन में प्रचलित सेक्स-व्यवहार और सेक्स संबंधित अपराधों को देखकर लगता है कि क़ब्र में गुजारे पिछले सत्तर साल के समय में, फ्रायड महोदय ने ज्यादा समय अपने लिखे और सोचे पर गर्व ही किया होगा। वह उन लोगों पर कभी-कभी व्यंग्य से मुस्कुराते भी रहे होंगे , जो उन्हें बिना पढ़े या जाने खारिज़ करने के फिराक़ में रहते हैं।

और, इन दिनों, दोमिनीक स्टाªस कान्ह का मामला सामने आने के बाद से तो वह फिर से ठहाका मार कर हंस रहे होंगे। ठहाका मारकर हंसने के ऐसे कई अवसर उन्हें अक्सर ही मिलते रहे हैं। कभी बिल क्लिटंन के सौजन्य से तो कभी नारायदत्त तिवारी के सौजन्य से।

डीएसके पर सोफीटेल होटल की एक परिचायिका ने आरोप लगाया कि उन्होंने उसके साथ बलात् सेक्स करने की कोशिश की। डीएसके पर ऐसे आरोप पहले भी लगे हैं। अभी त्रिसतेन बनों (अगर उच्चारण ग़लत हो तो माफ करें, क्योंकि फ्रंासीसी नाम और शब्द का उच्चारण एक गैर फ्रंासीसी अक्सर गलत ही करता है) नाम की लेखिका ने आरोप लगाया है कि एक साक्षात्कार के दौरान डीएसके उन पर भी टूट पड़े थे।

महिलाओं पर टूट पड़ने की अपनी आदिम आदत से डीएसके खुद भी परेशान हांेगे, मगर करें क्या? संभव है उनकी कुछ और शिकायत सामने आए। और यह भी संभव है कि उन आरोपों से फं्रास में उनकी लोकप्रियता थोड़ी और बढ़ जाय। संभव यह भी है कि इन सारे के सारे आरोपों का वही हश्र हो, सोफीटेल की आया के आरोप का हुआ।

न्यायालय में किसी अपराध का साबित होना (या ना होना) और दूसरी बहुत सी गैरज़रूरी बातों पर निर्भर करता है, जैसे, वकील कौन है, जज कौन है, या फिर आरोपी कौन है और अभियुक्त कौन। अपराध और आरोप की मंशा का पीछा करते हुए चालाक वकील एक ऐसी सामानांतर मगर भा्रमक स्थिति पैदा करते हैं कि अपराध और आरोप हाशिए पर चले जाते हैं , और न्याय गरीब बुढिए के बेलगाम बछरे की तरह पूंछ उठाकर इधर उधर दौड़ता रहता है।

डीएसके के मामले में भी ऐसा ही हुआ। अदालत में होटल की आया की मंशा पर ज्यादा बहस हुई उसे पहंुचे ज़ख्म पर कम। इस बात पर ज़्यादा शोर हुआ कि परिचायिका का चरित्र ढीला है। लेकिन डीएसके पर लगे पुराने आरोप को इस केस से अलग रखा गया।

खैर, ये ज्यादा पेंचिदा मामला है। इस मुददे पर शायद आप मुझसे बेहतर बातें कह सकते हैं। बहरहाल, मैं फ्रायड की बात कर रहा था कि वह इन दिनों बहुत खुश होंगे।

फ्रायड खुश होंगे कि देखो ‘मेरा यह मानना कि काम आवेग मनुष्य की जीवन-दिशा को प्रभावित करने वाला सबसे प्राथमिक और प्रबल आवेग है, कि यह आवेग इतना प्रबल है कि मनुष्य उसके वशीभूत होकर समय और स्वंय के होने तक का बोध खो देता है, एक बार फिर, इतने योग्य उदाहरण के साथ खड़ा उतरा है।

फ्रायड का मानना है कि मनुष्य के इस प्रबल आवेग के खतरे से निबटने के लिए ही सभ्यता और संबंध का सारा ताना बाना बुना गया, कि यह आवेग इतना प्रबल है कि लाख दबाने के बावजूद यह हमारे स्वप्न के रूप में प्रतिदिन प्रतिबिंबित होता है।

स्वपन की अर्थ-विवृति पर ढे़र काम हुए हैं। लेकिन सेक्स संबंधी अपराध के विश्लेषण के जरिए हम समाज, अपराधी और पीडि़त की सामाजिक हैसियत और उनके बीच के सामाजिक संबंध के कुछ दिलचस्प पहलू को खोल सकते हैं।

डीएसके एक बेहद सफल, स्वस्थ और आकर्षक व्यक्ति हैं। असफलता, अभाव, अस्वीकार जैसे अवधारणाओं से ये अवगत नहीं होते। अपनी सफलता और स्वीकार से ये इतने अभिभूत होते हैं कि उन्हें किसी की परवाह नहीं होती। अक्सर यह देखने को मिलता है कि ऐसे लोग अक्सर अपनी हैसियत के उद्दंड घोड़े पर बैठकर, अपनी लालसा तृप्ति के लिए कुछ भी कर सकते हैं , कहीं तक जा सकते हैं।

डीएसके के लिए एक आया की देह के लिए आया की स्वीकृति लेना जरूरी नहीं है। उन्हें जब जो देह चाहिए सो चाहिए। चैबीसों घंटे खुले माॅल में बिक रही वस्तु की तरह। जाईये और उठाईये। दुकानदार से ये पूछने की जरूरत क्या है कि ये सामान हम खरीदना चाहते हैं , बेचोगे क्या?

उन्हें रात के तीसरे पहर में पिज्ज़ा चाहिए। पिज़्जा उपलब्ध है। उन्हें अगले बीस मिनट बाद हज़ारों किलोमीटर दूर किसी से मिलने जाना है। वायुयान उपलब्ध है। उन्हें अपनी पत्नी (या पति) से अगले दिन तलाक चाहिए। लाॅ फर्म तैयार है।


फिर एक प्रवासी आया की देह की क्या बिसात! उठाईये। कीमत चुकाईये। बस। एक तरह से डीएसके गुजरे जमाने में स्त्रियों का अपहरण करनेवाले योद्धा का उत्तरआधुनिक संस्करण हैं। आवेगमय प्राणी। विवेकहीन मनुष्य।

(शायद) फ्रायड के मुताबिक आकर्षक स्त्रियों के प्रति आवेगी डीएसके का हमलावर रुख स्वाभाविक है। डीएसके जैसा आदमी अपने आवेग में इसी तरह का व्यवहार करेगा। भावुक प्रेम का शाईराना इज़हार की उम्मीद डीएसके से बेकार है।

कुछ लोग जो डीएसके नहीं हैं, जो अपने कैरियर में खम ठोककर नहीं, धोखे से, किसी चालाकी से सफल हुए हैं, उनके प्रेम में भी आपको एक तरह की चालाकी दिखेगी। वे बल का नहीं छल का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे लोग झांसा देने वाले लोग होते हैं।

मुझे मरहूम नीरज ग्रोवर की याद आ रही है। मारिया सुसाईराज ने बताया कि नीरज ने उसे झांसा दिया गया कि देह के बदले वे उसे अभिनय के बेहतर अवसर मुहैया कराते। भारत में यौन शोषण के ऐसे प्रपंची किस्से हजा़रों हज़ार मिलेंगे।

भारत या दुनिया भर के दूसरे पारंपरिक समाज व्यक्ति को प्रपंची और दंभी होने का अवसर नहीं देता था। लेकिन उत्तरआधुनिक समाज में प्रपंच और दंभ दोनों विशेष व्यक्तिगत गुण बन गए हैं।

विनयशील प्रेम ना सिर्फ हमारे सिनेमा के पर्दो से, बल्कि समाज से भी गायब होता जा रहा है। ये कोई चिंता की बात है भी! मुझे नहीं पता।

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