पहले तो सोचा कि जाने दूं। कितनी ही बार तो ऐसी भावनाओं से गुजरा जो साझाा करने लायक थीं। मूलतः आलस्य और अन्यतः किसी दूसरे तात्कालिक दवाब में वे हाथ और दिमाग दोनों से जाती रहीं।
दरअस्ल दोपहर को अचानक धनराज का फोन आया था। धनराज एक मित्र हैं , जिन्होंने अब तक जितनी बार फोन किया था, मुनींद्र सिंह की वजह से ही किया था। मुनींद्र सिंह शहर में नहीं हैं। मैं भी मुबई से पिछले बीस पच्चीस दिन बाद लौटा था। फिर भी धनराज के फोन को मैंने सहजता से लिया। उन्होंने जिज्ञासा बस पूछा कि लाईब्रेरी कैंटीन की तरफ मेरा आना होता है इन दिनों कि नहीं? मैंने कहा, शाम में एक चक्कर मार आने की कोशिश करूंगा।
संजय कुमार के यहां जाते जाते मैं यह बात भूल गया कि धनराज से लाईब्रेरी कैंटीन पर मिलने की बात हुई है। हम लोग लाईब्रेरी कैंटीन तक गए भी। लेकिन तभी देवेंद्र का फोन आया और तय हुआ कि गंगा ढाबे पर मिला जाय। हम लोग गाड़ी से बिना उतरे गंगा ढाबे लौट आए।
ढ्राबे पर राघवेंद्र सिंह और ज़ुल्फी के साथ वही भ्रष्ट राजनीति और पतनशील काग्रंस पार्टी की बातें की। देवेंद्र को किसी पार्टी में जाना था। वो ढाबे नहीं आए। संजय के साथ मैं घर लौट आया।
करीब दस बजे के करीब सरोज का फोन आया। प्रारंभिक औपचारिक बातों के बाद उन्होंने बताया कि मुनींद्र सिंह लौट आए हैं। यह खबर धनराज ने उन्हें बतायी थी।
मैं थोड़ा चैंका। मेरे चैंकने में जिज्ञासा का भाव कम था कि वो क्यों लौट आए, खुद के सही साबित होने का दंभ अधिक था कि उन्हें लौटकर ही आना था।
यहां मुनींद्र सिंह के बारे में थोड़ा लिखना जरूरी है। मुनींद्र सिंह जेएनयू के कुछ उन विरले छात्रों में से हैं , जो ज्ञान की तलाश में अपने विषय और अनुशासन की हदें तोड़ते रहे हैं। भले ही उसका कोई भी खामियाजा उन्हें क्यों ना भुगतना पड़े। वह 1997.98 की सितंबर की उमस भरी कोई शाम थी, जब कुछ सामान्य मित्रों के माध्यम से मुनींद्र सिंह से मेरी मुलाकात हुई। शायद संजय झा पहले मित्र थे , जिन्होंने मुझे मुनींद्र सिंह की राजनैतिक परियोजना के बारे में बताया था। फिर मुनींद्र सिंह से मिलने का सिलसिला चला और चलता रहा। वह एक दिलचस्प आदमी हैं। आपको उनकी ज़्यादातर बातें पसंद आएंगी अगर आप उनकी कुछ बातों को अनसुना करने की आदत डाल लें।
जेएनयू छोड़ने के करीब दो साल ढाई साल बाद मुझे मुनींद्र सिंह एक दिन गुरूद्वारा रकाबगंज रोड पर मिले। मैंने उनसे पूछा कि उनकी राजनैतिक परियोजना की क्या प्रगति है ? उन्होंने मुझे एक पत्रिका का अंक दिखाया और बताया कि परियोजना चल रही है और ये पत्रिका उसीका एक भाग है। उन्होंने मुझे उस पत्रिका का मुंबई में कुछ लोगों को सदस्य बनाने की जिम्मेदारी दी , जिसे मैं पूरा नहीं कर पाया।
मुंबई से जब कभी दिल्ली आता मुनींद्र से मुलाकात गाहे बगाहे होती रही। पिछले एक डेढ़ सालों से मेरा मुबंई प्रवास काफी अनियमित रहा। इन दिनों ज़्यादातर समय मेरा दिल्ली में ही गुजरा। आप अगर जेएनयू के पीछे वसंतकुंज में रह रहे हों और कोई नियमित काम भी नहीं कर रहे हों, फिर जेएनयू आने जाने से बचना कितना मुश्किल है, यह समझ सकते हैं। पिछले डेढ़ साल में मेरा जेएनयू आना जाना कुछ ज्यादा ही बढ़ गया। मुनीद्र के साथ और उनके माध्यम से कई नए दोस्तों से मुलाकात हुई। धनराज इसी अर्थ में मुनींद्र को पहले और मुझे बाद में जानते हैं। धनराज के अलावा शैलेंद्र, दिनमणि , शादाब , उज़ैर आदि कई ऐसे महत्वपूर्ण लोगों को मैं नहीं जानता अगर मुनींद्र नहीं होते।
खैर, अपनी पीएचडी पूरी करने के बाद देवेंद्र भी देश लौट आए थे और हम सब में वर्तमान राजनीति को लेकर भारी वितृष्णा और क्षोभ गहराया हुआ था। था क्या, बल्कि है। जनवरी के महीने में देश के चैदह गणमान्य नागरिकों ने प्रधानमंत्री के नाम एक खुली चिठठी लिखी और छपवायी थी जिसमें भ्रष्टाचार के अलावा सरकार के प्रति लोगों की लगातार कम होती आस्था के बारे में चिंता जताई गयी थी।
यह विचार भी मुनींद्र सिंह का ही था कि गणमान्य नागरिकों की इस चिटठी के जवाब में देश के चैदह सामान्य आदमी की एक चिटठी भेजी जाय। यह तय हुआ कि इस लंबी चिटठी में हम वर्तमान औपरिवेशिक राजनीतिक ढांचा पर सवाल उठाएंगे और इसे आमूलचूल बदलने की बात करेंगे। चिटठी लिखी गयी। उसे हर संभव जगह छपने और प्रसारित होने के लिए भेजा भी गया।
पर किसी अखबार, टीवी वाले ने चिटठी छापने की जहमत नहीं उठायी।
खैर, शैलेंद्र की कोशिश से इस बीच मुनींद्र की भेंट राजनैतिक आकांक्षा रखने वाले एक खास सज्जन से हुई। उसे मुनींद्र सिंह की राजनैतिक परियोजना की बात जंची।
उस सज्जन से मिलने मुनींद्र, शैलेंद्र, देवेंद्र और मैं पालम विहार गए। मीटिंग में ये तय हुआ कि हम सब मिलकर इस परियोजना को सफल बनाने की कोशिश करेंगे।
काम शुरू हुआ। हमें आॅफिस दिया गया। हमारी ज़रूरतों की सारी चीजें मुहैया करायी उसने। सिवा एक गाड़ी की। जिसकी बात हुई थी कि दिल्ली से आने जाने वालों के लिए एक गाड़ी उपलब्ध रहेगी। राकेश से जब मैंने गाड़ी की बात की तो उसने दो टूक शब्दों में बताया कि इस परियोजना में जिसे काम करना है , वो यहां रहकर करेगा। राकेश को ये लग रहा था कि इस परियोजना में मुनींद्र सिंह के अलावा किसी और की उसे कोई जरूरत नहीं है। जब मुनींद्र यहां रहेंगे तो किसी और की क्या जरूरत है !
इस बीच कुछ और बातें हुई जो थोड़ी बहुत हम सबको नागवार गुजरी। मुनींद्र के एक पूराने मित्र हैं जीत - संबुद्धो चक्रवर्ती। जीत को मैं भी जानता हूं - मुंबई में आलोक और ये साथ रहते थे कभी। जीत के जुड़ने के बाद उसकी पत्नी भी जुडीं। ये तो अच्छी बात थी। लेकिन पता चला कि आॅफिस के दो बेडरूम में से एक जिसे हम अपना वार रूम बनाने वाले थे उसमें जीत और उसकी पत्नी रहेगी। एक कमरा तो मुनींद्र के लिए था ही। दूसरा जीत और उसकी पत्नी के लिए आरक्षित कर दिया गया। मतलब आॅफिस के नाम पर आगे का बैठक खाना छोड़ दिया गया।
मुनींद्र के कुछ रवैये से मुझे तकलीफ हुई और मेरा मतभेद शुरू हो गया। सात जून की शाम को उनके साथ फेान पर आखिरी बात हुई। उन्होंने मुझे यह अहसास दिलाया कि यह उनके अकेले की परियोजना है और इसमें उन्हें मेरी कोई जरूरत नहीं है।
मैं भला कब चूकने वाला था! मैंने भी कुछ अप्रिय शब्द कहे और हमारी बातचीत बंद। इस बीच मुझे मुनींद्र की खबर मिलती रही। जो उनसे मिलने जाते, वे आकर बताते कि वहां क्या हो रहा है , क्या नहीं! सच मानिए, मैं उदासीन बना रहा इस परियोजना और मुनींद्र को लेकर। जब कभी इसके बारे में सोचा तो यही सोचा कि ऐसा करना संभव तो है, लेकिन मुनींद्र और जीत जैसे लोगों से नहीं।
सरोज से बात होने के बात धनराज से जब मैंने दुबारा पूछा कि मुनींद्र क्यों वापस आ गए तो धनराज ने बताया कि उनकी परियोजना इतनी बड़ी है और राकेश की आकांक्षा इतनी छोटी कि दोनों बेमेल हो रही थीं।
मुनींद्र वापस लौट आए हैं। लगभग पंद्रह दिन बाद वो मुंबई हैदराबाद और भोपाल की यात्रा करेंगे-किसी बड़ी राजनैतिक आकांक्षा वाले आदमी की तलाश में।
एक व्यक्ति के रूप में मुनींद्र की क्षमता पर मेरा शक्क गहरा गया है। भारत को लेकर उनके देखे गए सपने महान हैं। लेकिन उन सपनों को हासिल करने लिए जिस इस्पाती संकल्प और व्रत की जरूरत है, वो मुनींद्र सिंह में नहीं बचा। या है भी तो मैं नहीं देख पा रहा हूं।
मैं चाहता हूं कि मुनींद्र कुछ ऐसा करंे कि मेरा कहा सब झूठ और बकवास साबित हो जाय।
मुनींद्र सिंह के लौट आने पर आए बचकाने दंभ पर मुझे खेद है। मोर्चे से लौट आना एक अपमानजनक स्थिति होती है। मुनींद्र का लौट आना भी एक अवसादपूर्ण स्थिति है। अवसाद की इस घड़ी में स्वयं मैं भी अपमानित महसूस कर रहा हूं।
श्याम आनंद झा
Wednesday, August 10, 2011
Tuesday, August 2, 2011
अभिरूचि ही नहीं हमारी स्मृतियां भी गुलाम हैं।
शायद ही हम में से कोई अपने गांव या कस्बे को लेकर कभी इस प्रश्न से जूझता है कि वे हमें पसंद हैं कि नहीं? अमूमन वे हमें पसंद होते हैं। ज़्यादा लोगों को कुछ ज्यादा ही। ऐसे लोग हर बार, पहली बार के मुकाबले इन गुज़रे ज़माने की और ज्यादा रुमानी तस्वीर उकेंरते हैं।
अतीत में एक दुर्निवार आकर्षण होता है। जो कुछ भी बीत गया, छूट गया, उसे ना भी पाना चाहें तो भी उसके आस-पास घूमना या रहना अच्छा लगता है। अक्सर नशे में और कभी कभी बिना नशे में, हम इन बीते, छूटे, और टूटे हुए जगहों और वक्तों और इंसानों को याद करते हैं।
हम याद करते हैं कि स्कूल से आते वक्त गन्ना कैसे चुराए थे, आम कैसे तोड़े थे। हम याद करते हैं कि कैसे लड़ने के बावजूद दोस्तों से लड़ाई नहीं होती थी। हम याद करते हैं कि हम किस किस पर मरते थे और कौन कौन हमसे चिढ़ते थे।
ऐसे समय में जब किसी के लिए किसी के पास समय नहीं है, हम अपने लिए निकाले गए थोड़े से समय में अतीत के उन कोनों को टटोलते नज़र आते हैं जो हमारा इतना अपना है कि उसमें चाहें तो हम थोड़ा बहुत संशोधन भी कर सकते हैं। और किसी को पता भी नहीं चलता।
मिशाल के तौर पर गुलज़ार। गुलज़ार अपने ज्यादातर गीतों में हमें ऐसे ही खोये हुए संसार की झलक दिखाते हुए मिलते हैं, जिसमें अतीत इतना करीब और मांसल दिखता है कि मन करे - जाकर छू लें। और गुलज़ार ही क्यों, ऐसा तो कईयों ने किया है। गुलज़ार का नाम इसलिए जबान पर चढ रहा है क्योंकि वे इस कला में सबसे ज्यादा माहिर हैं।
नहीं, ऐसा नहीं है कि गुलज़ार का अतीत उतना ही गुलज़ार रहा होगा जितना कि उनके गीतों में दिखता है। बल्कि ज़्यादा संभव यह है कि उनके गांव, उनके बचपन या उनके अतीत में ऐसी कई बातें हुई होंगी जिन्हें वे याद नहीं करना चाहते। याद नहीं करना चाहते क्योंकि उससे कोई फ़ायदा नहीं है - मुहाबरे के अर्थ में नहीं, ठोस पेशेवर हिसाब-किताब की नज़र से।
लेकिन गुलज़ार के बारे में बात करने वाला मैं कौन होता हूं - खासकर उनके बचपन या उनके गांव या उनके अतीत के बारे में?
लेकिन अपना जिक़्र तो मैं कर ही सकता हूं। मेरा भी एक गांव है। मेरा भी बचपन था। और मेरी भी स्मृतियां हैं। दोस्तों के साथ या अकेले, नशे में या बिना नशे के, मैंने भी उन जगहों, लोगों और संदर्भों को याद किया है जो गुजर चुके हैं। और अक्सर ऐसे मौंकों पर मै भी काफ़ी सजग रहता हूं, दूसरों की तरह कि किसी भी क़ीमत पर गांव की रुमानी छवि कायम रहे।
गांव के अलावा जिस एक और जगह जिससे मुझे बेइम्त्हां मुहब्बत है वह है शहर मुंबह। मुंबई और मेरे गांव दोनों में कई ऐसी बातें हैं जो मेरे व्यक्तित्व के करीब बैठती हैं। ये एक अलग विषय है और इस पर स्वतंत्र चर्चा फिर कभी की जाएगी।
अभी कल शाम मैं अपने एक मित्र के साथ जुहू चैपाटी गया। नहीं, शाम नहीं, बल्कि रात थी। 11 से उपर बज रहे थे। आईसक्रीम खाते हुए हम दोनों किनारे तक आती लहरों से बचते हुए टहलने लगे। ये सोमवार की रात थी, इसलिए सप्ताहंत वाली भीड़ नहीं थी। भूटटे और चिप्स बेचते कुछ हाॅकर्स थे और बेहद बीमार सी दिखने वाली कई वेश्याएं।
हम लोग जेडब्लू मैरियट के पीछे रेत में फंसी एक बीएमडब्लू में सवार परेशान लोगों की मूर्खता पर हंस रहे थे। आस पास की वेश्याएं हर बात से बेखबर समंदर की लहरों को सूनी निगाहों से घूर रही थी। और अचानक मुझे अपना गांव याद आ गया।
मेरे गांव में वेश्याएं नहीं हैं। सेक्स संबंधी बीमारी के उपचार के लिए हकीमांें और बाबाओं के करामात की कहानियां भी आपको इधर नहीं मिलेंगी। सेक्स को लेकर कोई कुंठा या दंभ, सच मानिए, इस इलाके में आपको नहीं मिलेगा।
लेकिन मुझे याद है कि मैंने अपने गांव में सूनी निगाहों से आसमान, वृक्ष या बकरी को निहारते हुए लोगों को देखा है। मैंने ऐसी गरीबियां देखी हैं, जिन्हें यादकर मुझे डर लगता है। कई ऐसे लेाग थे, जिन्होंने शायद सालों साल भरपेट खाना नहीं खाया होता था। मैं उन्हें जानता था। मुझे अब तक उनके नाम याद हैं।
ये लोग पेट पर गमछी बांध कर भूख से लड़ते थे। और कभी-कभार आम और कटहल की चोरियां करते, कभी कभार पकड़े भी जाते। चूंकि चोरी करना पाप है। इसलिए इन्हें छोटी मोटी सजा भी दी जाती थी।
बीमार और काम करने की उम्र पार कर जाने के बावजूद ग्राहकों का इंतज़ार करती ये वेश्याएं और जिंदगी भर भूखे रहने वाले हमारे गांव के मज़दूर शायद ही हमारे स्वर्णिम अतीत का भाग बन पाते हैं।
ऐसा क्यों होता है? ऐसा इसलिए होता है कि हमारे आस पास की सांस्कृतिक संस्थाओं में हमें बताया गया कि अच्छी स्मृति क्या होती है। अच्छी स्मृति वही होती है जो बिकाउ होती है। अच्छी स्मृति होती हैं वे जो सुखी आदमी को परेशान ना करे। मीठी नींद के लिए हलके और हल्की लोरियां सुनाए।
हमारे समय के सारे महान बौद्धिक और रचनात्मक लोग आजकल इसी काम में लगे हैं। प्रसून जोशी नया सितारा है। आकाश के चंाद अभी भी गुलज़ार हैं।
और इनके देखा देखी और सुनी सुनायी हम भी उसी रास्ते पर बढ रहे हैं। हमारी पुरानी बातों में यात्रा के दौरान मिलीं वे सुंदर स्त्रियां होती हैं जो अपने पति और अपने बच्चे के साथ यात्रा पर इसलिए निकली थी कि आप से उसकी मुलाकात हो जाय।
टेन में खिलौना बेचती बूढी और लाचार औरत के बारे में हम कितनी बार सोचते हैं कि वह दिन भर में कितना कमाती होगी, कि इस बूढ़ापे में भीख मांगने वाले ये लोग कितने लाचार हैं!
बंबई हो या ब्रहमपूरा ये इतने ही रूमानी हैं जितना कि हम इन्हें देखना चाहते हैं!
क्यों ना हम अपनी स्मृतियों में थोड़ी जगह उनको भी दें, जिनके लिए कहीं कोई जगह नहीं है।
श्याम आनंद झा
अतीत में एक दुर्निवार आकर्षण होता है। जो कुछ भी बीत गया, छूट गया, उसे ना भी पाना चाहें तो भी उसके आस-पास घूमना या रहना अच्छा लगता है। अक्सर नशे में और कभी कभी बिना नशे में, हम इन बीते, छूटे, और टूटे हुए जगहों और वक्तों और इंसानों को याद करते हैं।
हम याद करते हैं कि स्कूल से आते वक्त गन्ना कैसे चुराए थे, आम कैसे तोड़े थे। हम याद करते हैं कि कैसे लड़ने के बावजूद दोस्तों से लड़ाई नहीं होती थी। हम याद करते हैं कि हम किस किस पर मरते थे और कौन कौन हमसे चिढ़ते थे।
ऐसे समय में जब किसी के लिए किसी के पास समय नहीं है, हम अपने लिए निकाले गए थोड़े से समय में अतीत के उन कोनों को टटोलते नज़र आते हैं जो हमारा इतना अपना है कि उसमें चाहें तो हम थोड़ा बहुत संशोधन भी कर सकते हैं। और किसी को पता भी नहीं चलता।
मिशाल के तौर पर गुलज़ार। गुलज़ार अपने ज्यादातर गीतों में हमें ऐसे ही खोये हुए संसार की झलक दिखाते हुए मिलते हैं, जिसमें अतीत इतना करीब और मांसल दिखता है कि मन करे - जाकर छू लें। और गुलज़ार ही क्यों, ऐसा तो कईयों ने किया है। गुलज़ार का नाम इसलिए जबान पर चढ रहा है क्योंकि वे इस कला में सबसे ज्यादा माहिर हैं।
नहीं, ऐसा नहीं है कि गुलज़ार का अतीत उतना ही गुलज़ार रहा होगा जितना कि उनके गीतों में दिखता है। बल्कि ज़्यादा संभव यह है कि उनके गांव, उनके बचपन या उनके अतीत में ऐसी कई बातें हुई होंगी जिन्हें वे याद नहीं करना चाहते। याद नहीं करना चाहते क्योंकि उससे कोई फ़ायदा नहीं है - मुहाबरे के अर्थ में नहीं, ठोस पेशेवर हिसाब-किताब की नज़र से।
लेकिन गुलज़ार के बारे में बात करने वाला मैं कौन होता हूं - खासकर उनके बचपन या उनके गांव या उनके अतीत के बारे में?
लेकिन अपना जिक़्र तो मैं कर ही सकता हूं। मेरा भी एक गांव है। मेरा भी बचपन था। और मेरी भी स्मृतियां हैं। दोस्तों के साथ या अकेले, नशे में या बिना नशे के, मैंने भी उन जगहों, लोगों और संदर्भों को याद किया है जो गुजर चुके हैं। और अक्सर ऐसे मौंकों पर मै भी काफ़ी सजग रहता हूं, दूसरों की तरह कि किसी भी क़ीमत पर गांव की रुमानी छवि कायम रहे।
गांव के अलावा जिस एक और जगह जिससे मुझे बेइम्त्हां मुहब्बत है वह है शहर मुंबह। मुंबई और मेरे गांव दोनों में कई ऐसी बातें हैं जो मेरे व्यक्तित्व के करीब बैठती हैं। ये एक अलग विषय है और इस पर स्वतंत्र चर्चा फिर कभी की जाएगी।
अभी कल शाम मैं अपने एक मित्र के साथ जुहू चैपाटी गया। नहीं, शाम नहीं, बल्कि रात थी। 11 से उपर बज रहे थे। आईसक्रीम खाते हुए हम दोनों किनारे तक आती लहरों से बचते हुए टहलने लगे। ये सोमवार की रात थी, इसलिए सप्ताहंत वाली भीड़ नहीं थी। भूटटे और चिप्स बेचते कुछ हाॅकर्स थे और बेहद बीमार सी दिखने वाली कई वेश्याएं।
हम लोग जेडब्लू मैरियट के पीछे रेत में फंसी एक बीएमडब्लू में सवार परेशान लोगों की मूर्खता पर हंस रहे थे। आस पास की वेश्याएं हर बात से बेखबर समंदर की लहरों को सूनी निगाहों से घूर रही थी। और अचानक मुझे अपना गांव याद आ गया।
मेरे गांव में वेश्याएं नहीं हैं। सेक्स संबंधी बीमारी के उपचार के लिए हकीमांें और बाबाओं के करामात की कहानियां भी आपको इधर नहीं मिलेंगी। सेक्स को लेकर कोई कुंठा या दंभ, सच मानिए, इस इलाके में आपको नहीं मिलेगा।
लेकिन मुझे याद है कि मैंने अपने गांव में सूनी निगाहों से आसमान, वृक्ष या बकरी को निहारते हुए लोगों को देखा है। मैंने ऐसी गरीबियां देखी हैं, जिन्हें यादकर मुझे डर लगता है। कई ऐसे लेाग थे, जिन्होंने शायद सालों साल भरपेट खाना नहीं खाया होता था। मैं उन्हें जानता था। मुझे अब तक उनके नाम याद हैं।
ये लोग पेट पर गमछी बांध कर भूख से लड़ते थे। और कभी-कभार आम और कटहल की चोरियां करते, कभी कभार पकड़े भी जाते। चूंकि चोरी करना पाप है। इसलिए इन्हें छोटी मोटी सजा भी दी जाती थी।
बीमार और काम करने की उम्र पार कर जाने के बावजूद ग्राहकों का इंतज़ार करती ये वेश्याएं और जिंदगी भर भूखे रहने वाले हमारे गांव के मज़दूर शायद ही हमारे स्वर्णिम अतीत का भाग बन पाते हैं।
ऐसा क्यों होता है? ऐसा इसलिए होता है कि हमारे आस पास की सांस्कृतिक संस्थाओं में हमें बताया गया कि अच्छी स्मृति क्या होती है। अच्छी स्मृति वही होती है जो बिकाउ होती है। अच्छी स्मृति होती हैं वे जो सुखी आदमी को परेशान ना करे। मीठी नींद के लिए हलके और हल्की लोरियां सुनाए।
हमारे समय के सारे महान बौद्धिक और रचनात्मक लोग आजकल इसी काम में लगे हैं। प्रसून जोशी नया सितारा है। आकाश के चंाद अभी भी गुलज़ार हैं।
और इनके देखा देखी और सुनी सुनायी हम भी उसी रास्ते पर बढ रहे हैं। हमारी पुरानी बातों में यात्रा के दौरान मिलीं वे सुंदर स्त्रियां होती हैं जो अपने पति और अपने बच्चे के साथ यात्रा पर इसलिए निकली थी कि आप से उसकी मुलाकात हो जाय।
टेन में खिलौना बेचती बूढी और लाचार औरत के बारे में हम कितनी बार सोचते हैं कि वह दिन भर में कितना कमाती होगी, कि इस बूढ़ापे में भीख मांगने वाले ये लोग कितने लाचार हैं!
बंबई हो या ब्रहमपूरा ये इतने ही रूमानी हैं जितना कि हम इन्हें देखना चाहते हैं!
क्यों ना हम अपनी स्मृतियों में थोड़ी जगह उनको भी दें, जिनके लिए कहीं कोई जगह नहीं है।
श्याम आनंद झा
Monday, July 18, 2011
आंख-कान की खुजली बनाती है एक घटिया फिल्म को हिट
खुज़ली एक बीमारी है। कुछ लोगों के लिए एक सुखद बीमारी। आखों पर पलकों का आधा परदा डालकर खुजलाते रहने वाले ये लोग इस बात से वाकिफ़ मगर बेपरवाह होते हैं कि इनकी ये मीठी खुजलाहट जल्द ही जलन में बदलने वाली है।
अभी कल तक हमारे समाज में कुछ लोग ऐसे थे, जो आपको टोकते, आगाह करते कि खुजली एक घटिया बीमारी है, कि खुजलाना सुख बटोरने का कोई तरीका नहीं है।
लेकिन अचानक हमारा समाज इतना शिष्ट और शालीन हो गया है कि आज आपको अपने किसी काम या कदम पर कोई रोकने टोकने वाला नहीं मिलेगा। बल्कि आप ऐसे लोगों से अपने को हमेशा घिरा पाएंगे जो आपको आपके हर एक काम पर प्रोत्साहन देते मिलेंगे, चाहे आप सबके सामने आंखें बंदकर खुजली ही क्यों ना रहे हों। वे कहेंगे, जी हां, जहां सुख इतना दुर्लभ हो, वहां अगर कोई खुजलाते हुए ही सुख बटोर रहा है तो वह क्या ही अच्छा काम कर रहा है!
वर्तमान कला और उसकी समीक्षा परिदश्य को देखकर तो कम से कम ऐसा ही लगता है।
अभी पिछले से पिछले हफता एक फिल्म रिलीज़ हुई ‘डेल्ही बेली‘। इस फिल्म को लेकर जो उत्तेजना सिनेमा समीक्षकों के बीच दिखी वह चैंकाने वाली भी है और काफी रहस्यमयी भी। सच पूछिए तो, इन समीक्षकों में इस तरह के जोश-खरोश देखकर भ्रम होने लगता है कि कहीं फिल्म समीक्षा भी प्रायोजित कार्यक्रम का एक अंग तो नहीं बन गयी है?
यह फिल्म फिल्म नितिन बेरी (कुणाल राय कपूर) की टट्टी और सोमयाजुलू के हीरे की उलटफेर के आस पास घूमती है। नहीं, कहानी के विस्त्ृत व्यौरे में जाने की ज़रूरत नहीं है। क्योंकि अगर आपने देख ली है तो, और अगर नहीं देखी है तो, कहने लायक इस कहानी में कुछ है नहीं। और, वैसे भी हम फिल्म पर बात कर रहे हैं इसकी कहानी पर नहीं।
फिल्म में सबसे पहले तो यह स्पष्ट नहीं है कि ब्लादिमिर हीरे का पैकेट जो उसे सोमयाजुलू तक पहुंचाना है, सोनिया को क्यांे देता है? सोनिया ब्लादिमिर और सोमयाजुलू के लिए काम करती है, इसकी कोई भनक फिल्म आपको लगने नहीं देती। अगर मान लेते हैं कि सोनिया ब्लादिमिर के लिए काम करती भी है तो वह इतने महत्वपर्ण कन्साईनमेंट अपने एक ऐसे लापरवाह दोस्त को कैसे दे सकती है, जिसे वो इतने अच्छी तरह से जानती है कि उसके साथ सोती है, और उससे शादी करने वाली है।
आगे हम देखते हैं कि सुबह का वक्त है और तीन दोस्त घोड़े बेच कर सो रहे हैं। नितिन बेरी (कुणाल राय कपूर) तो इतनी बेसूधी सो रहा है कि उसकी चडढी नीचे सड़क गयी है और उसके पिछवाड़े का ऊपरी भाग दिखाई दे रहा है। एक सोते हुए आदमी का चडढी से झांकता पिछवाड़ा सिनेमा के लेखक और निर्देशक को इतना लुभावना लगा कि एक ही सीन में कम से कम इसके तीन शाॅट हैं।
निस्संदेह, दर्शकों के बीच से कुछ दबी हुई सी हंसी भी सुनाई देती है आपको। नहीं, आप चैंक कर दाएं बाएं या पीछे मुड़कर अंधेरे में इन दबकर हंसने वाले को पहचानने की कोशिश नहीं कर सकते, कि कौन हैं ये लोग जिन्हें आदमी के शरीर के किसी विशेष भाग को देखकर हंसी आ रही है! चारों तरफ अंधेरा है, और हर दर्शक चेहराहीन है।
चलिए, आगे बढ़ते हैं। दरवाजे पर खट-खट की आवाज़ होती है। तीनों में से कोई उठने को तैयार नहीं है। अंत में तिशा (इमरान खान) उठता है और वह अपने दोनों दोस्तों के पिछवाड़े पर एक एक लात लगाता है कि वे क्यों नहीं उठे, कि उसे क्यों उठना पड़ा!
तिशा की लगायी गयी लात खीज़ में कम मुहब्बत में लगायी गयी ज्यादा है, इतना तो मैं भी समझता हूं। लेकिन उसने लात लगायी क्यों? मुहब्बत जाहिर करने का यह कौन सा तरीका है?
फिल्म के लेखक-निर्देशक ने शायद सोचा होगा कि इससे यह साबित हो जाएगा कि तिशा फिल्म का हिरो है। लेकिन इसकी क्या ज़्ारूरत थी?
फिल्म के निर्माता आमिर खान हैं, और उनमें उनका भांजा इमरान काम कर रहा है। फिर भी किसी को ये उम्मीद कैसी करनी चाहिए कि वीर दास या कुणाल राय कपूर या कोई और फिल्म का नायक हो सकता था!
नहीं ठहरिये, मुझे याद आ रहा है कि दर्शकों को फिल्म का यह सिक्वेंस भी अच्छा लगा था। वे हंसे थे, इतना तो मैं निश्चियपूर्वक कह सकता हूं। क्यों हंसे थे, यह मैं नहीं जानता।
परंत,ु मैं इतना जानता हूं कि इस फिल्म के आस पास गुजरे जमाने के भांड की तरह शोर मचाने वाले सिनेमा-समीक्षकों को भी यह सिक्वेंस अच्छा लगा होगा। दर्शकों से तो नहीं, पर समीक्षकों से यह पूछने का हक तो मैं रखता हूं कि उनसे पूछूं, इस सिक्वेंस पर आप हंस थे, तो क्यों? और नहीं हसे थे, तो इसके बारे लिखा क्यों नहीं।
खीज़कर पलटवार करते हुए कोई यह कह सकता है कि दोस्तों के बीच ऐसा होता है। मैं भी मानता हूं कि ऐसा होता है। हमारी देखी और जिअी दोस्ती में भी ऐसा हुआ है। हमने दोस्तों को मारा है तो उससे मार खाया भी है।
मगर नहीं। फिल्म में ऐसा कुछ नहीं होता है। तिशा अपने दोस्तों के पिछवाड़े पर लात मारता है लेकिन उसके पिछवाड़े की तरफ कोई आंख उठाकर भी नहीं देखता।
वर्चस्व की लड़ाई कहां तक पैठ चुकी है! पति-पत्नि के संबंध पदरे पर आज भी तिरछा ही दिखाया जाता है। अभी पीछे की कुछ हिंद फिल्मों में नायक के दोस्त, दोस्त कम चापलूस ज्यादा नज़र आते हैं। ये नहीं जानते, जिन्हें ये दोस्त समझ रहे हैं, वे दोस्त नहीं चापलूस हैं। दास्ेती से ताल्लुक रखने वाली पहले की फिल्मों में ऐसा नहीं होता था। वहां रिश्ते में दोनों या सब बराबर होते थे।
इस फिल्म में तिशा बाकी के अपने दोस्तों से विशिष्ट कैसे है, यह स्पष्ट नहीं है। वीरदास और कुणाल राय कपूर का एक जैसा दिखाया गया है, जबकि तिशा इनके साथ , लेकिन इनसे अलग रूप में पेश किया गया है।
‘डेल्ही बेली‘ एक खराब फिल्म है यह साबित करने की इज़ाजत मुझे अपने ब्लाॅग का फारमेट नहीं देता। हम दर्शकांे पर भी दोष नहीं देते कि उनकी अभिरूचि में ऐसा पतन क्यों देखने को मिलता है? लेकिन हम अपने समीक्षकों से तो यह पूछ सकते हैं कि प्रशंशा के पुल बांधने से पहले वे फिल्मों की बारीकियांे की ओर ईशारा क्यों नहीं करते?
संभव है कि वे फिल्मों के इन कमज़ोर पक्षों के बारे में जानते हों, पर किसी दबाव में ऐसा कहने से हिचकते हों?
स्ंाभव यह भी है वे इन भेदों को नहीं जानते!
वेवज़ह गाली देने वाले इंसान को हम ज़्यादा साहसी नहीं कहते। फिल्म में वीरदास का गाली या इससे संबंधित शब्द बोलना हर बार बेतुका है।
आपने गौर किया, फिल्म में इमरान एक बार भी इस तरह के शब्द का इस्तेमाल नहीं करता। नहीं ये अच्छी बात नहीं है। फिल्म में जो दो सबसे व्यस्क दृष्य हैं, उनमें भी इमरान के इमेज को बचाने की शर्मनाक कोशिश हुई है। दोनों ही दृष्यों में फिल्म की नायिकाओं ने हिम्मत दिखाई है, और फायदा ईमरान को मिला।
और ये पांचवी फेल टाईप का गीत ‘‘भाग डीकेबोस‘‘!
ये सब क्या है ?
लोग ऐसी चीजें पसंद कर रहे हैं, क्योंकि उनकी आंखें और कानें सप्ताह भर से खुजला रहे हैं। कुछ भी सुनाईये, कुछ भी दिखाईये, उन्हें पसंद आएगा। थोड़ा समीक्षकों का थोड़ा शोर शराबा हो जाय तो कहना ही क्या!
आप इससे अन्यथा सोचते हों तो बताएं।
श्याम आनंद झा
अभी कल तक हमारे समाज में कुछ लोग ऐसे थे, जो आपको टोकते, आगाह करते कि खुजली एक घटिया बीमारी है, कि खुजलाना सुख बटोरने का कोई तरीका नहीं है।
लेकिन अचानक हमारा समाज इतना शिष्ट और शालीन हो गया है कि आज आपको अपने किसी काम या कदम पर कोई रोकने टोकने वाला नहीं मिलेगा। बल्कि आप ऐसे लोगों से अपने को हमेशा घिरा पाएंगे जो आपको आपके हर एक काम पर प्रोत्साहन देते मिलेंगे, चाहे आप सबके सामने आंखें बंदकर खुजली ही क्यों ना रहे हों। वे कहेंगे, जी हां, जहां सुख इतना दुर्लभ हो, वहां अगर कोई खुजलाते हुए ही सुख बटोर रहा है तो वह क्या ही अच्छा काम कर रहा है!
वर्तमान कला और उसकी समीक्षा परिदश्य को देखकर तो कम से कम ऐसा ही लगता है।
अभी पिछले से पिछले हफता एक फिल्म रिलीज़ हुई ‘डेल्ही बेली‘। इस फिल्म को लेकर जो उत्तेजना सिनेमा समीक्षकों के बीच दिखी वह चैंकाने वाली भी है और काफी रहस्यमयी भी। सच पूछिए तो, इन समीक्षकों में इस तरह के जोश-खरोश देखकर भ्रम होने लगता है कि कहीं फिल्म समीक्षा भी प्रायोजित कार्यक्रम का एक अंग तो नहीं बन गयी है?
यह फिल्म फिल्म नितिन बेरी (कुणाल राय कपूर) की टट्टी और सोमयाजुलू के हीरे की उलटफेर के आस पास घूमती है। नहीं, कहानी के विस्त्ृत व्यौरे में जाने की ज़रूरत नहीं है। क्योंकि अगर आपने देख ली है तो, और अगर नहीं देखी है तो, कहने लायक इस कहानी में कुछ है नहीं। और, वैसे भी हम फिल्म पर बात कर रहे हैं इसकी कहानी पर नहीं।
फिल्म में सबसे पहले तो यह स्पष्ट नहीं है कि ब्लादिमिर हीरे का पैकेट जो उसे सोमयाजुलू तक पहुंचाना है, सोनिया को क्यांे देता है? सोनिया ब्लादिमिर और सोमयाजुलू के लिए काम करती है, इसकी कोई भनक फिल्म आपको लगने नहीं देती। अगर मान लेते हैं कि सोनिया ब्लादिमिर के लिए काम करती भी है तो वह इतने महत्वपर्ण कन्साईनमेंट अपने एक ऐसे लापरवाह दोस्त को कैसे दे सकती है, जिसे वो इतने अच्छी तरह से जानती है कि उसके साथ सोती है, और उससे शादी करने वाली है।
आगे हम देखते हैं कि सुबह का वक्त है और तीन दोस्त घोड़े बेच कर सो रहे हैं। नितिन बेरी (कुणाल राय कपूर) तो इतनी बेसूधी सो रहा है कि उसकी चडढी नीचे सड़क गयी है और उसके पिछवाड़े का ऊपरी भाग दिखाई दे रहा है। एक सोते हुए आदमी का चडढी से झांकता पिछवाड़ा सिनेमा के लेखक और निर्देशक को इतना लुभावना लगा कि एक ही सीन में कम से कम इसके तीन शाॅट हैं।
निस्संदेह, दर्शकों के बीच से कुछ दबी हुई सी हंसी भी सुनाई देती है आपको। नहीं, आप चैंक कर दाएं बाएं या पीछे मुड़कर अंधेरे में इन दबकर हंसने वाले को पहचानने की कोशिश नहीं कर सकते, कि कौन हैं ये लोग जिन्हें आदमी के शरीर के किसी विशेष भाग को देखकर हंसी आ रही है! चारों तरफ अंधेरा है, और हर दर्शक चेहराहीन है।
चलिए, आगे बढ़ते हैं। दरवाजे पर खट-खट की आवाज़ होती है। तीनों में से कोई उठने को तैयार नहीं है। अंत में तिशा (इमरान खान) उठता है और वह अपने दोनों दोस्तों के पिछवाड़े पर एक एक लात लगाता है कि वे क्यों नहीं उठे, कि उसे क्यों उठना पड़ा!
तिशा की लगायी गयी लात खीज़ में कम मुहब्बत में लगायी गयी ज्यादा है, इतना तो मैं भी समझता हूं। लेकिन उसने लात लगायी क्यों? मुहब्बत जाहिर करने का यह कौन सा तरीका है?
फिल्म के लेखक-निर्देशक ने शायद सोचा होगा कि इससे यह साबित हो जाएगा कि तिशा फिल्म का हिरो है। लेकिन इसकी क्या ज़्ारूरत थी?
फिल्म के निर्माता आमिर खान हैं, और उनमें उनका भांजा इमरान काम कर रहा है। फिर भी किसी को ये उम्मीद कैसी करनी चाहिए कि वीर दास या कुणाल राय कपूर या कोई और फिल्म का नायक हो सकता था!
नहीं ठहरिये, मुझे याद आ रहा है कि दर्शकों को फिल्म का यह सिक्वेंस भी अच्छा लगा था। वे हंसे थे, इतना तो मैं निश्चियपूर्वक कह सकता हूं। क्यों हंसे थे, यह मैं नहीं जानता।
परंत,ु मैं इतना जानता हूं कि इस फिल्म के आस पास गुजरे जमाने के भांड की तरह शोर मचाने वाले सिनेमा-समीक्षकों को भी यह सिक्वेंस अच्छा लगा होगा। दर्शकों से तो नहीं, पर समीक्षकों से यह पूछने का हक तो मैं रखता हूं कि उनसे पूछूं, इस सिक्वेंस पर आप हंस थे, तो क्यों? और नहीं हसे थे, तो इसके बारे लिखा क्यों नहीं।
खीज़कर पलटवार करते हुए कोई यह कह सकता है कि दोस्तों के बीच ऐसा होता है। मैं भी मानता हूं कि ऐसा होता है। हमारी देखी और जिअी दोस्ती में भी ऐसा हुआ है। हमने दोस्तों को मारा है तो उससे मार खाया भी है।
मगर नहीं। फिल्म में ऐसा कुछ नहीं होता है। तिशा अपने दोस्तों के पिछवाड़े पर लात मारता है लेकिन उसके पिछवाड़े की तरफ कोई आंख उठाकर भी नहीं देखता।
वर्चस्व की लड़ाई कहां तक पैठ चुकी है! पति-पत्नि के संबंध पदरे पर आज भी तिरछा ही दिखाया जाता है। अभी पीछे की कुछ हिंद फिल्मों में नायक के दोस्त, दोस्त कम चापलूस ज्यादा नज़र आते हैं। ये नहीं जानते, जिन्हें ये दोस्त समझ रहे हैं, वे दोस्त नहीं चापलूस हैं। दास्ेती से ताल्लुक रखने वाली पहले की फिल्मों में ऐसा नहीं होता था। वहां रिश्ते में दोनों या सब बराबर होते थे।
इस फिल्म में तिशा बाकी के अपने दोस्तों से विशिष्ट कैसे है, यह स्पष्ट नहीं है। वीरदास और कुणाल राय कपूर का एक जैसा दिखाया गया है, जबकि तिशा इनके साथ , लेकिन इनसे अलग रूप में पेश किया गया है।
‘डेल्ही बेली‘ एक खराब फिल्म है यह साबित करने की इज़ाजत मुझे अपने ब्लाॅग का फारमेट नहीं देता। हम दर्शकांे पर भी दोष नहीं देते कि उनकी अभिरूचि में ऐसा पतन क्यों देखने को मिलता है? लेकिन हम अपने समीक्षकों से तो यह पूछ सकते हैं कि प्रशंशा के पुल बांधने से पहले वे फिल्मों की बारीकियांे की ओर ईशारा क्यों नहीं करते?
संभव है कि वे फिल्मों के इन कमज़ोर पक्षों के बारे में जानते हों, पर किसी दबाव में ऐसा कहने से हिचकते हों?
स्ंाभव यह भी है वे इन भेदों को नहीं जानते!
वेवज़ह गाली देने वाले इंसान को हम ज़्यादा साहसी नहीं कहते। फिल्म में वीरदास का गाली या इससे संबंधित शब्द बोलना हर बार बेतुका है।
आपने गौर किया, फिल्म में इमरान एक बार भी इस तरह के शब्द का इस्तेमाल नहीं करता। नहीं ये अच्छी बात नहीं है। फिल्म में जो दो सबसे व्यस्क दृष्य हैं, उनमें भी इमरान के इमेज को बचाने की शर्मनाक कोशिश हुई है। दोनों ही दृष्यों में फिल्म की नायिकाओं ने हिम्मत दिखाई है, और फायदा ईमरान को मिला।
और ये पांचवी फेल टाईप का गीत ‘‘भाग डीकेबोस‘‘!
ये सब क्या है ?
लोग ऐसी चीजें पसंद कर रहे हैं, क्योंकि उनकी आंखें और कानें सप्ताह भर से खुजला रहे हैं। कुछ भी सुनाईये, कुछ भी दिखाईये, उन्हें पसंद आएगा। थोड़ा समीक्षकों का थोड़ा शोर शराबा हो जाय तो कहना ही क्या!
आप इससे अन्यथा सोचते हों तो बताएं।
श्याम आनंद झा
Friday, July 8, 2011
गायब ही होता जा रहा है विनयशील प्रेम
सिगमंड फ्रायड के ज़्यादातर विचारों पर उनके मरने के बाद उनके चेले या फिर उनके चेले के चेलों ने कुछ गंभीर सवाल उठाये। पश्चिम के आधुनिक क्रांतिकारी विचारकों और दार्शनिकों को फूटी आंख न पसंद करने वाले भारतीय विश्वविद्यालयी बुद्धिजीवियों के बीच न तो फ्रायड के विचारों की कोई कद्र है और न उन सवालों की, जो उठे थे। यहां यह बस मान लिया गया है कि फ्रायड कोई झक्की सा मनोचिकित्सक था, जिसने सेक्स-वेक्स के बारे में कुछ बातें की थीं।
प्रश्न उठाए गए विषयों या विचारों को भारत में अशुभ माना जाता है। जैसे ही किसी भी मौलिक और लोकप्रिय शोध पर प्रश्न उठे, उत्तेजना में आकर हमारे देशी विद्वान उन विचारों को बेकार और बेमतलब मानने लगते हैं।
माक्र्स , डार्विन , फ्रायड जैसे युगांतकारी विचारकों के बारे में आज लगभग यही रवैया देखा जाता है। नैतिकता की तेल पिलाई हुई लाठी लेकर वे कहते नज़र आएंगे, ‘कौन, माक्र्स और कौन डार्विन ? और, फ्रायड, उसकी तो बात ही मत कीजिए। वह क्या बोलेगा, उसके तो अपनी साली के साथ ही अनैतिक संबंध थे।‘
लेकिन आम जनजीवन में प्रचलित सेक्स-व्यवहार और सेक्स संबंधित अपराधों को देखकर लगता है कि क़ब्र में गुजारे पिछले सत्तर साल के समय में, फ्रायड महोदय ने ज्यादा समय अपने लिखे और सोचे पर गर्व ही किया होगा। वह उन लोगों पर कभी-कभी व्यंग्य से मुस्कुराते भी रहे होंगे , जो उन्हें बिना पढ़े या जाने खारिज़ करने के फिराक़ में रहते हैं।
और, इन दिनों, दोमिनीक स्टाªस कान्ह का मामला सामने आने के बाद से तो वह फिर से ठहाका मार कर हंस रहे होंगे। ठहाका मारकर हंसने के ऐसे कई अवसर उन्हें अक्सर ही मिलते रहे हैं। कभी बिल क्लिटंन के सौजन्य से तो कभी नारायदत्त तिवारी के सौजन्य से।
डीएसके पर सोफीटेल होटल की एक परिचायिका ने आरोप लगाया कि उन्होंने उसके साथ बलात् सेक्स करने की कोशिश की। डीएसके पर ऐसे आरोप पहले भी लगे हैं। अभी त्रिसतेन बनों (अगर उच्चारण ग़लत हो तो माफ करें, क्योंकि फ्रंासीसी नाम और शब्द का उच्चारण एक गैर फ्रंासीसी अक्सर गलत ही करता है) नाम की लेखिका ने आरोप लगाया है कि एक साक्षात्कार के दौरान डीएसके उन पर भी टूट पड़े थे।
महिलाओं पर टूट पड़ने की अपनी आदिम आदत से डीएसके खुद भी परेशान हांेगे, मगर करें क्या? संभव है उनकी कुछ और शिकायत सामने आए। और यह भी संभव है कि उन आरोपों से फं्रास में उनकी लोकप्रियता थोड़ी और बढ़ जाय। संभव यह भी है कि इन सारे के सारे आरोपों का वही हश्र हो, सोफीटेल की आया के आरोप का हुआ।
न्यायालय में किसी अपराध का साबित होना (या ना होना) और दूसरी बहुत सी गैरज़रूरी बातों पर निर्भर करता है, जैसे, वकील कौन है, जज कौन है, या फिर आरोपी कौन है और अभियुक्त कौन। अपराध और आरोप की मंशा का पीछा करते हुए चालाक वकील एक ऐसी सामानांतर मगर भा्रमक स्थिति पैदा करते हैं कि अपराध और आरोप हाशिए पर चले जाते हैं , और न्याय गरीब बुढिए के बेलगाम बछरे की तरह पूंछ उठाकर इधर उधर दौड़ता रहता है।
डीएसके के मामले में भी ऐसा ही हुआ। अदालत में होटल की आया की मंशा पर ज्यादा बहस हुई उसे पहंुचे ज़ख्म पर कम। इस बात पर ज़्यादा शोर हुआ कि परिचायिका का चरित्र ढीला है। लेकिन डीएसके पर लगे पुराने आरोप को इस केस से अलग रखा गया।
खैर, ये ज्यादा पेंचिदा मामला है। इस मुददे पर शायद आप मुझसे बेहतर बातें कह सकते हैं। बहरहाल, मैं फ्रायड की बात कर रहा था कि वह इन दिनों बहुत खुश होंगे।
फ्रायड खुश होंगे कि देखो ‘मेरा यह मानना कि काम आवेग मनुष्य की जीवन-दिशा को प्रभावित करने वाला सबसे प्राथमिक और प्रबल आवेग है, कि यह आवेग इतना प्रबल है कि मनुष्य उसके वशीभूत होकर समय और स्वंय के होने तक का बोध खो देता है, एक बार फिर, इतने योग्य उदाहरण के साथ खड़ा उतरा है।
फ्रायड का मानना है कि मनुष्य के इस प्रबल आवेग के खतरे से निबटने के लिए ही सभ्यता और संबंध का सारा ताना बाना बुना गया, कि यह आवेग इतना प्रबल है कि लाख दबाने के बावजूद यह हमारे स्वप्न के रूप में प्रतिदिन प्रतिबिंबित होता है।
स्वपन की अर्थ-विवृति पर ढे़र काम हुए हैं। लेकिन सेक्स संबंधी अपराध के विश्लेषण के जरिए हम समाज, अपराधी और पीडि़त की सामाजिक हैसियत और उनके बीच के सामाजिक संबंध के कुछ दिलचस्प पहलू को खोल सकते हैं।
डीएसके एक बेहद सफल, स्वस्थ और आकर्षक व्यक्ति हैं। असफलता, अभाव, अस्वीकार जैसे अवधारणाओं से ये अवगत नहीं होते। अपनी सफलता और स्वीकार से ये इतने अभिभूत होते हैं कि उन्हें किसी की परवाह नहीं होती। अक्सर यह देखने को मिलता है कि ऐसे लोग अक्सर अपनी हैसियत के उद्दंड घोड़े पर बैठकर, अपनी लालसा तृप्ति के लिए कुछ भी कर सकते हैं , कहीं तक जा सकते हैं।
डीएसके के लिए एक आया की देह के लिए आया की स्वीकृति लेना जरूरी नहीं है। उन्हें जब जो देह चाहिए सो चाहिए। चैबीसों घंटे खुले माॅल में बिक रही वस्तु की तरह। जाईये और उठाईये। दुकानदार से ये पूछने की जरूरत क्या है कि ये सामान हम खरीदना चाहते हैं , बेचोगे क्या?
उन्हें रात के तीसरे पहर में पिज्ज़ा चाहिए। पिज़्जा उपलब्ध है। उन्हें अगले बीस मिनट बाद हज़ारों किलोमीटर दूर किसी से मिलने जाना है। वायुयान उपलब्ध है। उन्हें अपनी पत्नी (या पति) से अगले दिन तलाक चाहिए। लाॅ फर्म तैयार है।
फिर एक प्रवासी आया की देह की क्या बिसात! उठाईये। कीमत चुकाईये। बस। एक तरह से डीएसके गुजरे जमाने में स्त्रियों का अपहरण करनेवाले योद्धा का उत्तरआधुनिक संस्करण हैं। आवेगमय प्राणी। विवेकहीन मनुष्य।
(शायद) फ्रायड के मुताबिक आकर्षक स्त्रियों के प्रति आवेगी डीएसके का हमलावर रुख स्वाभाविक है। डीएसके जैसा आदमी अपने आवेग में इसी तरह का व्यवहार करेगा। भावुक प्रेम का शाईराना इज़हार की उम्मीद डीएसके से बेकार है।
कुछ लोग जो डीएसके नहीं हैं, जो अपने कैरियर में खम ठोककर नहीं, धोखे से, किसी चालाकी से सफल हुए हैं, उनके प्रेम में भी आपको एक तरह की चालाकी दिखेगी। वे बल का नहीं छल का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे लोग झांसा देने वाले लोग होते हैं।
मुझे मरहूम नीरज ग्रोवर की याद आ रही है। मारिया सुसाईराज ने बताया कि नीरज ने उसे झांसा दिया गया कि देह के बदले वे उसे अभिनय के बेहतर अवसर मुहैया कराते। भारत में यौन शोषण के ऐसे प्रपंची किस्से हजा़रों हज़ार मिलेंगे।
भारत या दुनिया भर के दूसरे पारंपरिक समाज व्यक्ति को प्रपंची और दंभी होने का अवसर नहीं देता था। लेकिन उत्तरआधुनिक समाज में प्रपंच और दंभ दोनों विशेष व्यक्तिगत गुण बन गए हैं।
विनयशील प्रेम ना सिर्फ हमारे सिनेमा के पर्दो से, बल्कि समाज से भी गायब होता जा रहा है। ये कोई चिंता की बात है भी! मुझे नहीं पता।
प्रश्न उठाए गए विषयों या विचारों को भारत में अशुभ माना जाता है। जैसे ही किसी भी मौलिक और लोकप्रिय शोध पर प्रश्न उठे, उत्तेजना में आकर हमारे देशी विद्वान उन विचारों को बेकार और बेमतलब मानने लगते हैं।
माक्र्स , डार्विन , फ्रायड जैसे युगांतकारी विचारकों के बारे में आज लगभग यही रवैया देखा जाता है। नैतिकता की तेल पिलाई हुई लाठी लेकर वे कहते नज़र आएंगे, ‘कौन, माक्र्स और कौन डार्विन ? और, फ्रायड, उसकी तो बात ही मत कीजिए। वह क्या बोलेगा, उसके तो अपनी साली के साथ ही अनैतिक संबंध थे।‘
लेकिन आम जनजीवन में प्रचलित सेक्स-व्यवहार और सेक्स संबंधित अपराधों को देखकर लगता है कि क़ब्र में गुजारे पिछले सत्तर साल के समय में, फ्रायड महोदय ने ज्यादा समय अपने लिखे और सोचे पर गर्व ही किया होगा। वह उन लोगों पर कभी-कभी व्यंग्य से मुस्कुराते भी रहे होंगे , जो उन्हें बिना पढ़े या जाने खारिज़ करने के फिराक़ में रहते हैं।
और, इन दिनों, दोमिनीक स्टाªस कान्ह का मामला सामने आने के बाद से तो वह फिर से ठहाका मार कर हंस रहे होंगे। ठहाका मारकर हंसने के ऐसे कई अवसर उन्हें अक्सर ही मिलते रहे हैं। कभी बिल क्लिटंन के सौजन्य से तो कभी नारायदत्त तिवारी के सौजन्य से।
डीएसके पर सोफीटेल होटल की एक परिचायिका ने आरोप लगाया कि उन्होंने उसके साथ बलात् सेक्स करने की कोशिश की। डीएसके पर ऐसे आरोप पहले भी लगे हैं। अभी त्रिसतेन बनों (अगर उच्चारण ग़लत हो तो माफ करें, क्योंकि फ्रंासीसी नाम और शब्द का उच्चारण एक गैर फ्रंासीसी अक्सर गलत ही करता है) नाम की लेखिका ने आरोप लगाया है कि एक साक्षात्कार के दौरान डीएसके उन पर भी टूट पड़े थे।
महिलाओं पर टूट पड़ने की अपनी आदिम आदत से डीएसके खुद भी परेशान हांेगे, मगर करें क्या? संभव है उनकी कुछ और शिकायत सामने आए। और यह भी संभव है कि उन आरोपों से फं्रास में उनकी लोकप्रियता थोड़ी और बढ़ जाय। संभव यह भी है कि इन सारे के सारे आरोपों का वही हश्र हो, सोफीटेल की आया के आरोप का हुआ।
न्यायालय में किसी अपराध का साबित होना (या ना होना) और दूसरी बहुत सी गैरज़रूरी बातों पर निर्भर करता है, जैसे, वकील कौन है, जज कौन है, या फिर आरोपी कौन है और अभियुक्त कौन। अपराध और आरोप की मंशा का पीछा करते हुए चालाक वकील एक ऐसी सामानांतर मगर भा्रमक स्थिति पैदा करते हैं कि अपराध और आरोप हाशिए पर चले जाते हैं , और न्याय गरीब बुढिए के बेलगाम बछरे की तरह पूंछ उठाकर इधर उधर दौड़ता रहता है।
डीएसके के मामले में भी ऐसा ही हुआ। अदालत में होटल की आया की मंशा पर ज्यादा बहस हुई उसे पहंुचे ज़ख्म पर कम। इस बात पर ज़्यादा शोर हुआ कि परिचायिका का चरित्र ढीला है। लेकिन डीएसके पर लगे पुराने आरोप को इस केस से अलग रखा गया।
खैर, ये ज्यादा पेंचिदा मामला है। इस मुददे पर शायद आप मुझसे बेहतर बातें कह सकते हैं। बहरहाल, मैं फ्रायड की बात कर रहा था कि वह इन दिनों बहुत खुश होंगे।
फ्रायड खुश होंगे कि देखो ‘मेरा यह मानना कि काम आवेग मनुष्य की जीवन-दिशा को प्रभावित करने वाला सबसे प्राथमिक और प्रबल आवेग है, कि यह आवेग इतना प्रबल है कि मनुष्य उसके वशीभूत होकर समय और स्वंय के होने तक का बोध खो देता है, एक बार फिर, इतने योग्य उदाहरण के साथ खड़ा उतरा है।
फ्रायड का मानना है कि मनुष्य के इस प्रबल आवेग के खतरे से निबटने के लिए ही सभ्यता और संबंध का सारा ताना बाना बुना गया, कि यह आवेग इतना प्रबल है कि लाख दबाने के बावजूद यह हमारे स्वप्न के रूप में प्रतिदिन प्रतिबिंबित होता है।
स्वपन की अर्थ-विवृति पर ढे़र काम हुए हैं। लेकिन सेक्स संबंधी अपराध के विश्लेषण के जरिए हम समाज, अपराधी और पीडि़त की सामाजिक हैसियत और उनके बीच के सामाजिक संबंध के कुछ दिलचस्प पहलू को खोल सकते हैं।
डीएसके एक बेहद सफल, स्वस्थ और आकर्षक व्यक्ति हैं। असफलता, अभाव, अस्वीकार जैसे अवधारणाओं से ये अवगत नहीं होते। अपनी सफलता और स्वीकार से ये इतने अभिभूत होते हैं कि उन्हें किसी की परवाह नहीं होती। अक्सर यह देखने को मिलता है कि ऐसे लोग अक्सर अपनी हैसियत के उद्दंड घोड़े पर बैठकर, अपनी लालसा तृप्ति के लिए कुछ भी कर सकते हैं , कहीं तक जा सकते हैं।
डीएसके के लिए एक आया की देह के लिए आया की स्वीकृति लेना जरूरी नहीं है। उन्हें जब जो देह चाहिए सो चाहिए। चैबीसों घंटे खुले माॅल में बिक रही वस्तु की तरह। जाईये और उठाईये। दुकानदार से ये पूछने की जरूरत क्या है कि ये सामान हम खरीदना चाहते हैं , बेचोगे क्या?
उन्हें रात के तीसरे पहर में पिज्ज़ा चाहिए। पिज़्जा उपलब्ध है। उन्हें अगले बीस मिनट बाद हज़ारों किलोमीटर दूर किसी से मिलने जाना है। वायुयान उपलब्ध है। उन्हें अपनी पत्नी (या पति) से अगले दिन तलाक चाहिए। लाॅ फर्म तैयार है।
फिर एक प्रवासी आया की देह की क्या बिसात! उठाईये। कीमत चुकाईये। बस। एक तरह से डीएसके गुजरे जमाने में स्त्रियों का अपहरण करनेवाले योद्धा का उत्तरआधुनिक संस्करण हैं। आवेगमय प्राणी। विवेकहीन मनुष्य।
(शायद) फ्रायड के मुताबिक आकर्षक स्त्रियों के प्रति आवेगी डीएसके का हमलावर रुख स्वाभाविक है। डीएसके जैसा आदमी अपने आवेग में इसी तरह का व्यवहार करेगा। भावुक प्रेम का शाईराना इज़हार की उम्मीद डीएसके से बेकार है।
कुछ लोग जो डीएसके नहीं हैं, जो अपने कैरियर में खम ठोककर नहीं, धोखे से, किसी चालाकी से सफल हुए हैं, उनके प्रेम में भी आपको एक तरह की चालाकी दिखेगी। वे बल का नहीं छल का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे लोग झांसा देने वाले लोग होते हैं।
मुझे मरहूम नीरज ग्रोवर की याद आ रही है। मारिया सुसाईराज ने बताया कि नीरज ने उसे झांसा दिया गया कि देह के बदले वे उसे अभिनय के बेहतर अवसर मुहैया कराते। भारत में यौन शोषण के ऐसे प्रपंची किस्से हजा़रों हज़ार मिलेंगे।
भारत या दुनिया भर के दूसरे पारंपरिक समाज व्यक्ति को प्रपंची और दंभी होने का अवसर नहीं देता था। लेकिन उत्तरआधुनिक समाज में प्रपंच और दंभ दोनों विशेष व्यक्तिगत गुण बन गए हैं।
विनयशील प्रेम ना सिर्फ हमारे सिनेमा के पर्दो से, बल्कि समाज से भी गायब होता जा रहा है। ये कोई चिंता की बात है भी! मुझे नहीं पता।
Wednesday, June 29, 2011
क्योंकि, मनुष्य एक प्रचारवादी प्राणी है।
फेसबुक पर कई मित्र अपने नवजात शिशु की तस्वीरें लगाते हैं - सोते हुए अबोध की अनजाने में ली हुई तस्वीरं।
उन तस्वीरों पर बधाई और बधाईनुमा टिप्पणी देने वालों की संख्या और उत्साह देखकर मन में एक हूक सी उठती है - इतने सारे शिशु-प्रेमी एक साथ! साधुवाद!
बधाईयों और प्रशंसा से गदगद ये मित्र अपने शिशुओं की प्रगति की फिर माहवार तस्वीर लगाते हैं। और उन्हें माहवार बधाईयां मिलती जाती हैं। और ये सिलसिला जारी रहता है।
लोग अपने घरों की, अपनी गाडि़यों की अपने बीते लमहों की तस्वीरें लगाते नहीं थकते। और उनकी उन फोटो और टिप्पणियों पर वाह वाह करते उनके मित्र भी नहीं थकते।
मेरे दिल का हूक टीस में और टीस दर्द में बदलता रहता है।
कई बार मन किया कि अपने मित्रांे को टोकूं, ‘भाई साहब, जिसकी तस्वीर लगा रहे हो, उससे एक बार पूछ तो लो।‘ लेकिन कुछ खास मित्रों की सलाह और सामाजिक शालीनता के कारण टोकने की अपनी ललक को टालता रहा।
पिछले कुछ दिनों में औपचारिक बधाईयां लेने देने की गतिविधि इतनी ज्यादा बढ गयी है कि आप कुछ भी कीजिए , उसके बारे में बताईये ज़रूर। जैसे कि आपने पकोड़ा खाया तो, बताईये कि आपने पकोड़ा खाया। और उम्मीद कीजिए कि आपके मित्र आपके पकोड़े खाने पर आपको बधाई देंगे।
बधाई के इस कारोबार में मैं खुद को हमेशा किनारे पर ही पाया। मैं पकोड़े खाने जैसी चीज पर बधाई देने में हिचकता हूं। मैं इस बात पर भी बधाई देने में हिचकता हूं कि आपक आप वसंतकुंज से उठकर पहाड़गंज चले गए या जयपुर चले गए या फिर बंगलादेश और अमेरिका ही क्यों ना चले गए।
मुझे लगता है मनुष्य एक विचरणशीलप्राणी है और इन बातों के लिए बधाई देना वैसा ही होगा जैसे किसी बच्चे को उसके हंसने या रोने के लिए बधाई दी जाय।
लेकिन हमारे कई मित्र ऐसे हैं जो आपके थैले पर लगे एअर टैग देखकर बधाई देने के लिए तैयार हो जाएंगे ‘‘बधाई हो, आपने हवाई यात्रा की है !‘‘
मैं सोचता रहा कि बधाई देने लेने वाले ये लोग ऐसा क्यों करते हैं, इतना शोर क्यों मचाते हैं ? आप एक घटिया सी कहानी, घटिया सी कविता या घटिया सी फोटो खीचिए और चिपका दीजिए फेसबुक पर। और देखिए बधाईयुक्त टिप्पणियों की झड़ी!
संभव है बधाईयों से मेरी चिढ़ इसलिए भी हो कि मुझे अपने किए धरे के लिए कभी कुछ खास बधाई नहीं मिली है। मेरे सबसे करीबी संबंधी और मित्रों का मानना तो ये है कि मैंने अब तक कुछ ही नहीं तो बधाई किसी बात की। इन दोनों बातों में सत्यता है।
फिर भी, कुछ बातें बल-धकेल।
एक प्राणी के रूप में आदमी की कई विशेषता बताई गयी है। जैसे, मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, मनुष्य हथियार बनाने वाला प्राणी है, मनुष्य भाषा का प्रयोग करने वाला प्राणी है, मनुष्य आध्यात्मिक प्राणी है, आदि और इत्यादि।
आदमी के इन वैशिष्ट्य को बताने वाले इन विद्वानों ने, जाहिर तौर पर कई शोध और प्रयोग किए, तब जाकर वे अपने-अपने निष्कर्ष पर पहुंचे।
लेकिन बिना प्रयोग के, सिर्फ अनुभव के आधार पर , और इसमें सन्निहित सारे खतरे को उठाते हुए, यह भी कहा जा सकता है कि आदमी एक प्रचारवादी प्राणी है।
इस पृथ्वी का दूसरा कोई प्राणी अपने होने, करने, लेने, देने, जीने, मरने - मतलब कि ‘ने‘ से खत्म होने वाले जितने भी कर्म-कुकर्म हैं, का जितना ढिंढोरा आदमी पीटता है, कोई दूसरा प्राणी नहीं।
इस छोटी सी बात को साबित करने के लिए ज़्यादा मशक्कत करने की जरूरत नहीं है। एक कुत्ता या दुनिया का कोई भी दूसरा जीव अपने पैदा होने से लेकर मरने तक सारा काम बिना ढिंढोरा पीटे करता है।
अभी हाल तक आदमी भी ऐसा ही करता था। उसे इतना पता था कि व्यक्तिगत स्तर पर कौन सी सूचना छिपाने लायक है और कौन सी बताने लायक। इतना ही नहीं, उसे ये भी पता था कि कौन सी सूचना किससे छिपायी जाए और कौन सी किससे बतायी जाय।
लेकिन सूचना क्रांति की आंधी में आदमी की ये समझ हवा हो गयी। आज हम सब अपनी-अपनी दुकान सजाये बैठे हैं अपनी-अपनी सूचना बेचने के लिए। जो सूचना जितनी ताजा, निजी, और व्यक्तिगत होगी, उसकी क़ीमत उतनी ही ज़्यादा।
हर दृष्टि से पुरुष की निजता मुकाबले स्त्री की निजता एक ज्यादा गंभीर विषय है। इसलिए खुल्लम खुल्ला सूचना के इस युग में स्त्री की निज़ता के बहाने, आईये, सूचना की प्रकृति और प्रारूप को देखें।
ऐश्वर्या राय सूचना समाज़ की पहली स्त्री नहीं है , जिसके गर्भवती होने की खबर से हम सब बाखबर हैं। ऐश्वर्या से पहले भी कई नामी गिरामी हस्ती गर्भवती हुईं। अभी हाल में कार्ला ब्रूनी के गर्भवती होने की खबर आयी। उससे पहले डेमी मूर के बारे में तो हम सब जानते हैं ‘जिन्होंने गर्भ के नौंवे महीने में अपनी निर्वस्त्र तस्वीर खिंचवाईं थीं।
गर्भवती होना स्त्री के लिए एक स्वाभाविक स्थिति है (आजकल तो कुछ हिम्मतवर पुरुष के लिए भी)।
शायद ही कोई ऐसी स्त्री होगी, जो अपनी इस स्थिति को अपने आस पास के लोगों से छिपा पाती होगी। लेकिन गर्भवती होने की अपनी स्थिति के बारे में पूरी दुनिया को बताना कृत्रिम और भौंडे नाटकीय प्रचार के सस्ता नुस्खा से ज़्यादा कुछ नहीं लगता।
नहीं, मैं किसी व्यक्ति, उसकी किसी स्थिति, उस स्थिति के बारे में किसी खबर या सूचना के खिलाफ नहीं हूं। मैं सूचना बनाने वाले इस तंत्र की चालाकी और इस तंत्र की चपेट में आने वाले लोगों की मासूमियत से दंग हूं।
निजी और अंतरंग सूचना का एक बड़ा बाज़ार तैयार हो रहा है। पोर्न इंडस्टी अपने खरीददारों की बढती मांग पूरी करने के लिए मुख्य धारा के अखबार और टेलीविजन का सहारा ले रही है।
रियलिटी टेलीविज़न शो के नाम पर दिखाए जा रहे कार्यक्रम (एगोनी आंट या मोमेंट आफ टु्रथ) की विषय-वस्तु को गौर से देखिए और डरिये और चेतिए।
आज सेलीब्रिटी की खबर बिक रही है। कल जिसकी खबर बिकेगी वही सेलीब्रिटी होगा। आपके सबसे अंतरंग समय के सीधे प्रसारण के ढेर सारे दर्शक भी मिलेंगे और प्रायोजक भी।
नहीं, न्युड डांस बार के इलाके के सभी पड़ोसियों के लिए यह अनिवार्य नहीं होता कि वे भी अपने कपड़े खोलें और जाकर डांस बार में नाचने लगें।
फेसबुक, ब्लाॅगस्पाॅट, यूट्युब के आने से विचार और सूचना की आवाजाही तेज हुई है , लेकिन इन माध्यमों में जहां आपका कोई संपादक/संचालक नहीं है, वहां आपको अपनी एक एक बात ज्यादा सोच-समझकर रखना होगा। प्रचार की अपनी मायावी भूख पर काबू पाईये और सांस्कृतिक मधुमेह (डायबीटीज़)
के शिकार होने से बचिए।
श्याम आनंद झा
उन तस्वीरों पर बधाई और बधाईनुमा टिप्पणी देने वालों की संख्या और उत्साह देखकर मन में एक हूक सी उठती है - इतने सारे शिशु-प्रेमी एक साथ! साधुवाद!
बधाईयों और प्रशंसा से गदगद ये मित्र अपने शिशुओं की प्रगति की फिर माहवार तस्वीर लगाते हैं। और उन्हें माहवार बधाईयां मिलती जाती हैं। और ये सिलसिला जारी रहता है।
लोग अपने घरों की, अपनी गाडि़यों की अपने बीते लमहों की तस्वीरें लगाते नहीं थकते। और उनकी उन फोटो और टिप्पणियों पर वाह वाह करते उनके मित्र भी नहीं थकते।
मेरे दिल का हूक टीस में और टीस दर्द में बदलता रहता है।
कई बार मन किया कि अपने मित्रांे को टोकूं, ‘भाई साहब, जिसकी तस्वीर लगा रहे हो, उससे एक बार पूछ तो लो।‘ लेकिन कुछ खास मित्रों की सलाह और सामाजिक शालीनता के कारण टोकने की अपनी ललक को टालता रहा।
पिछले कुछ दिनों में औपचारिक बधाईयां लेने देने की गतिविधि इतनी ज्यादा बढ गयी है कि आप कुछ भी कीजिए , उसके बारे में बताईये ज़रूर। जैसे कि आपने पकोड़ा खाया तो, बताईये कि आपने पकोड़ा खाया। और उम्मीद कीजिए कि आपके मित्र आपके पकोड़े खाने पर आपको बधाई देंगे।
बधाई के इस कारोबार में मैं खुद को हमेशा किनारे पर ही पाया। मैं पकोड़े खाने जैसी चीज पर बधाई देने में हिचकता हूं। मैं इस बात पर भी बधाई देने में हिचकता हूं कि आपक आप वसंतकुंज से उठकर पहाड़गंज चले गए या जयपुर चले गए या फिर बंगलादेश और अमेरिका ही क्यों ना चले गए।
मुझे लगता है मनुष्य एक विचरणशीलप्राणी है और इन बातों के लिए बधाई देना वैसा ही होगा जैसे किसी बच्चे को उसके हंसने या रोने के लिए बधाई दी जाय।
लेकिन हमारे कई मित्र ऐसे हैं जो आपके थैले पर लगे एअर टैग देखकर बधाई देने के लिए तैयार हो जाएंगे ‘‘बधाई हो, आपने हवाई यात्रा की है !‘‘
मैं सोचता रहा कि बधाई देने लेने वाले ये लोग ऐसा क्यों करते हैं, इतना शोर क्यों मचाते हैं ? आप एक घटिया सी कहानी, घटिया सी कविता या घटिया सी फोटो खीचिए और चिपका दीजिए फेसबुक पर। और देखिए बधाईयुक्त टिप्पणियों की झड़ी!
संभव है बधाईयों से मेरी चिढ़ इसलिए भी हो कि मुझे अपने किए धरे के लिए कभी कुछ खास बधाई नहीं मिली है। मेरे सबसे करीबी संबंधी और मित्रों का मानना तो ये है कि मैंने अब तक कुछ ही नहीं तो बधाई किसी बात की। इन दोनों बातों में सत्यता है।
फिर भी, कुछ बातें बल-धकेल।
एक प्राणी के रूप में आदमी की कई विशेषता बताई गयी है। जैसे, मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, मनुष्य हथियार बनाने वाला प्राणी है, मनुष्य भाषा का प्रयोग करने वाला प्राणी है, मनुष्य आध्यात्मिक प्राणी है, आदि और इत्यादि।
आदमी के इन वैशिष्ट्य को बताने वाले इन विद्वानों ने, जाहिर तौर पर कई शोध और प्रयोग किए, तब जाकर वे अपने-अपने निष्कर्ष पर पहुंचे।
लेकिन बिना प्रयोग के, सिर्फ अनुभव के आधार पर , और इसमें सन्निहित सारे खतरे को उठाते हुए, यह भी कहा जा सकता है कि आदमी एक प्रचारवादी प्राणी है।
इस पृथ्वी का दूसरा कोई प्राणी अपने होने, करने, लेने, देने, जीने, मरने - मतलब कि ‘ने‘ से खत्म होने वाले जितने भी कर्म-कुकर्म हैं, का जितना ढिंढोरा आदमी पीटता है, कोई दूसरा प्राणी नहीं।
इस छोटी सी बात को साबित करने के लिए ज़्यादा मशक्कत करने की जरूरत नहीं है। एक कुत्ता या दुनिया का कोई भी दूसरा जीव अपने पैदा होने से लेकर मरने तक सारा काम बिना ढिंढोरा पीटे करता है।
अभी हाल तक आदमी भी ऐसा ही करता था। उसे इतना पता था कि व्यक्तिगत स्तर पर कौन सी सूचना छिपाने लायक है और कौन सी बताने लायक। इतना ही नहीं, उसे ये भी पता था कि कौन सी सूचना किससे छिपायी जाए और कौन सी किससे बतायी जाय।
लेकिन सूचना क्रांति की आंधी में आदमी की ये समझ हवा हो गयी। आज हम सब अपनी-अपनी दुकान सजाये बैठे हैं अपनी-अपनी सूचना बेचने के लिए। जो सूचना जितनी ताजा, निजी, और व्यक्तिगत होगी, उसकी क़ीमत उतनी ही ज़्यादा।
हर दृष्टि से पुरुष की निजता मुकाबले स्त्री की निजता एक ज्यादा गंभीर विषय है। इसलिए खुल्लम खुल्ला सूचना के इस युग में स्त्री की निज़ता के बहाने, आईये, सूचना की प्रकृति और प्रारूप को देखें।
ऐश्वर्या राय सूचना समाज़ की पहली स्त्री नहीं है , जिसके गर्भवती होने की खबर से हम सब बाखबर हैं। ऐश्वर्या से पहले भी कई नामी गिरामी हस्ती गर्भवती हुईं। अभी हाल में कार्ला ब्रूनी के गर्भवती होने की खबर आयी। उससे पहले डेमी मूर के बारे में तो हम सब जानते हैं ‘जिन्होंने गर्भ के नौंवे महीने में अपनी निर्वस्त्र तस्वीर खिंचवाईं थीं।
गर्भवती होना स्त्री के लिए एक स्वाभाविक स्थिति है (आजकल तो कुछ हिम्मतवर पुरुष के लिए भी)।
शायद ही कोई ऐसी स्त्री होगी, जो अपनी इस स्थिति को अपने आस पास के लोगों से छिपा पाती होगी। लेकिन गर्भवती होने की अपनी स्थिति के बारे में पूरी दुनिया को बताना कृत्रिम और भौंडे नाटकीय प्रचार के सस्ता नुस्खा से ज़्यादा कुछ नहीं लगता।
नहीं, मैं किसी व्यक्ति, उसकी किसी स्थिति, उस स्थिति के बारे में किसी खबर या सूचना के खिलाफ नहीं हूं। मैं सूचना बनाने वाले इस तंत्र की चालाकी और इस तंत्र की चपेट में आने वाले लोगों की मासूमियत से दंग हूं।
निजी और अंतरंग सूचना का एक बड़ा बाज़ार तैयार हो रहा है। पोर्न इंडस्टी अपने खरीददारों की बढती मांग पूरी करने के लिए मुख्य धारा के अखबार और टेलीविजन का सहारा ले रही है।
रियलिटी टेलीविज़न शो के नाम पर दिखाए जा रहे कार्यक्रम (एगोनी आंट या मोमेंट आफ टु्रथ) की विषय-वस्तु को गौर से देखिए और डरिये और चेतिए।
आज सेलीब्रिटी की खबर बिक रही है। कल जिसकी खबर बिकेगी वही सेलीब्रिटी होगा। आपके सबसे अंतरंग समय के सीधे प्रसारण के ढेर सारे दर्शक भी मिलेंगे और प्रायोजक भी।
नहीं, न्युड डांस बार के इलाके के सभी पड़ोसियों के लिए यह अनिवार्य नहीं होता कि वे भी अपने कपड़े खोलें और जाकर डांस बार में नाचने लगें।
फेसबुक, ब्लाॅगस्पाॅट, यूट्युब के आने से विचार और सूचना की आवाजाही तेज हुई है , लेकिन इन माध्यमों में जहां आपका कोई संपादक/संचालक नहीं है, वहां आपको अपनी एक एक बात ज्यादा सोच-समझकर रखना होगा। प्रचार की अपनी मायावी भूख पर काबू पाईये और सांस्कृतिक मधुमेह (डायबीटीज़)
के शिकार होने से बचिए।
श्याम आनंद झा
Tuesday, June 21, 2011
झूठ , जिससे हम सबका वास्ता है!
महाभारत की कई कहानियां झूठ और सच के महीन अंतर को रेखांकित करती हैं। जब गुरू द्रोण पांडवों की सेना पर कहर ढा रहे थे , उनके प्रकोप से बचने के लिए एक उपाय के बारे में सोचा गया जो झूठ पर आधारित था।
कृष्ण ने रणनीति बनाई की अगले दिन के युद्ध में अश्वत्थामा नाम के हाथी को मारा जाय और प्रचार किया जाय कि द्रोण का बेटा अश्वत्थामा मारा गया।
सच बोलने के लिए मशहूर युद्धिष्ठिर ने इसे अनुचित माना और कृष्ण की बात माानने से अस्वीकार कर दिया। लेकिन उन्हें कृष्ण ने अपनी समझदारी से आधा सच और आधा झूठ बोलने के लिए राजी कर लिया।
अगले दिन हुआ भी वही। अश्वत्थामा हाथी मारा गया। और युद्ध लड़ते हुए द्रोण के कान तक बात पहुंचायी गयी कि उनका बेटा अश्वत्थामा मारा गया।
कृष्ण की कुटिलता से परिचित द्रोण ने समाचार के सत्यापन के लिए युद्धिष्ठिर से पूछा कि क्या सचमुच मेरा बेटा अश्वत्थामा मारा गया ? युद्विष्ठिर ने जवाब दिया ‘जी गुरूदेव, अश्वत्थामा मारा गया। ‘ कहानी के मुताबिक युद्धिष्ठिर के इतना कहते ही कृष्ण ने जोर से शंख बजाया और गुरू द्रोण युद्धिष्ठिर के कथन का उत्तराशं - ‘लेकिन नर नहीं, हाथी‘, नहीं सुन पाए।
इस बात पर अभी भी बहस हो सकती है कि युद्धिष्ठिर ने जो कहा वो सच था या झूठ ? विश्वास ना हो तो राम से पूछिए। वह चाहें तो दोनों बातें साबित कर सकते हैं। आप सहमत हों या ना , बला से। राम कौन ? राम जेठमलानी।
खैर, भारत की पौराणिक और धार्मिक कहानियों से पता चलता है कि अपने यहंा झूठ बोलने की लंबी परंपरा है। झूठ सच नामक सिक्के का दूसरा पहलू भर है। शायद कभी झूठ का अच्छा खास बोलबाला रहा होगा, ऐसा अनुमान सच के प्रति बाद के दूराग्रह को देखकर लगाया जा सकता है।
सच के साथ जुड़ी नैतिकता को अगर थोड़ी देर के लिए स्थगित कर दें तो इस बात से असहमत होना कठिन होगा कि झूठ बोलना एक रचनाशील काम है। आपमें कल्पनाशीलता और रचनाशीलता जैसे गुण नहीं हैं तो आप झूठ नहीं बोल सकते।
बच्चे इस बात के सबसे अच्छे उदाहरण हो सकते हैं। बच्चे झूठ नहीं बोलते , तब तक जब तक कि वे बोलना सीखने में व्यस्त रहते हैं। एक बार जब वे भाषा के सामान्य अर्थ और नीहितार्थ का भेद जान लेते हैं , फिर जम कर बोलते हैं। एक बच्चा के दिमाग की तीक्ष्णता , कल्पनाशीलता और रचनाशीलता का पता इस बात से लगाया जा सकता है कि वो अपने सच और भाषा के साथ कैसा खिलवाड़ करता है।
लेकिन हम बच्चे से सच बोलने की जिद्द करते हैं। अपनी बुद्धि का डंडा चलाते हुए हर बार बच्चे का झूठ पकड़ लेते हैं और कहते हैं - ‘नहीं , झूठ नहीं। झूठ से मुझे सख़्त नफ़रत है। तुम झूठ बोलोगे और मैं पकड़ लूंगा। खबरदार जो फिर कभी झूठ बोला।‘
सच बोलने की इस जिद्द के पीछे शायद हमारे बलवादी देवताओं का और उनके समर्थकों का हाथ है। सच
के ज्यादातर पैरोकार पौराणिक कहानियों के वे क्षत्रिय राजकुमार हैं , जो भले ही बलवान हों लेकिन उनकी बुद्धि की तीक्ष्णता संदीग्ध है।
राम से पहले राजा हरिश्चंद्र की कहानी हम जानते हैं। कहानी के मुताकिब हरिश्चंद्र शायद राम के पूर्वज ही थे। हरिश्चंद्र सत्य तो बोलते थे , लेकिन उनकी सत्यता आत्मघाती था और उसमें किसी किस्म की विलक्षणता का अभाव है। उनके यहां सत्य हठ बन जाता है। हरिष्चंद्र की कहानी भोंडे ढंग से नाटकीय और भावुक है। इतना नाटकीय है कि अविश्वसनीय है। जो इंसान सपने और जीवन के फर्क को ना समझ ना पाए , उससे और क्या उम्मीद कर सकते हैं !
सत्य के प्रति राम का आग्रह भी मूलतः उनके बल का आग्रह ही था। राम को अगर वाल्मीकि , कंबन , तुलसी , और रामानंद सागर जैसे कवि कहानीकारों का साथ नहीं मिला होता तो, हमें उनके सत्य प्रेम से ज्यादा उनके बल प्रेम के बारे में पता होता।
भारतीय देवताओं में ज्यादातर बाहुबली क्षत्रिय हैं , जिनके चरित्र में हास - परिहास और जीवन के रंग का भारी अभाव है। अपने अनुभव से हम इस बात को समझ सकते हैं कि अपने बल और सामथ्र्य में अंधा विश्वास रखने वाला कभी अपनी वाक्श्क्ति पर भरोसा नहीं करता। रामायण की कहानी में कोई ऐसा अंश नहीं है जब आप राम के वाक्चातुर्य से मोहित हो जांय। संक्षेप में राम बुद्धि के नहीं बल के देवता हैं।
ब्ुद्धि वाले सारे गुण कृष्ण में थे। इसलिए कृष्ण को झूठ से कोई परेशानी नहीं है। वह झूठ बोलते भी हैं और झूठ बोलने वाले को प्रश्रय भी देते हैं।
झूठ को पाप घोषित किए जाने के पीछे इन्हीं बलवादी देवताओं के समर्थकों का हाथ है। जो भी हो, झूठ के बिना दुनियावी इंसान का काम नहीं चल सकता। हम अक्सर झूठ का सहारा ऐसी ही परिस्थितियों में लेते हैं, जहां सच हमें मुश् िकल में डाल सकता है। झूठ की इस सामाजिक उपयोगिता को हम अस्वीकार नहीं कर सकते।
लेकिन विडंबना है कि झूठ का सहारा लेकर जीने वाले आप-हम जैसे तमाम लोग झूठ और झूठ बोलने वाले को कोसने का कोई अवसर नहीं छोडते। बात-बात में यह कहना कि ‘ये झूठ है , गलत है या फिर कि फलां आदमी पर विष्वास नहीं किया जा सकता क्योंकि वो झूठ बोलता है , झूठ और झूठ बोलने वालों की सामाजिक प्रतिष्ठा में बड़ी बाधा पैदा करती है।
जो लोग सच को सर पर लेकर घूमते हैं , वे भी बगल में झूठ की गठरी दवाए रखते हैं। हमारे यहां तो लोग झूठ की खेती करने का आरोप दूसरे पर लगाते हैं , लेकिन झूठ की फसल काट कर अपना गुज़ारा चलाते हैं।
अगर हम आज के सूचना युग और सूचना समाज को देखें तो यहां एक चीज जो सबसे ज्यादा झूठ बेची या खरीदी जाती है वह है झूठ। राष्टीय अंतराष्टीय स्तर के झूठ के कुछ नमूने देखिए: श्रीलंका के किसी चट्टान पर सीता के पद चिन्ह दिखाई देते हैं। साईवेरिया में कहीं दूसरे ग्रह के अज्ञात जीव का शव मिलता है। भारत दुनिया का सबसे आदर्श लोकतंत्र है। अमेरिका दुनिया में लोकतंत्र और शांति स्थापित करना चाहता है। ओसामा बिन लादेन शहीद हो गया। कांग्रेस की सरकार भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए कटिवद्ध है। भाजपा एक राष्टवादी पार्टी है। मायावती दलितों के उत्थान के लिए काम करती है। राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनने के लायक है। करुणा की कनी ने सिनेयुग के तोरानी से 200 रूपए कर्ज लिए थे। ये इस सूचना युग और समाज के ऐसे भोंडे सत्य हैं जिन्हें जन-संचार के उपलब्ध सारे माध्यम प्रचारित प्रसारित करने में व्यस्त हैं।
समस्या इन शर्मनाक भौंडे सत्यों से नहीं हैं। सच का जाप करते हमारे लोकतांत्रिक संस्थाओं से है। विद्यालय से लेकर न्यायालय तक और सड़क से लेकर संसद तक पिछले साठ सालों में सच की पूंछ पकड़कर राजा हरिश्चंद्र की ये संतानें आज यहां तक पहुंच चुकी है।
अगर हमने झूठ को , जीवन के रास रंग को , हास परिहास को अपने सार्वजनिक संस्थानों में थोड़ी सी इज्ज़त दी होती तो हमारा सच इतना लिजलिज़ा नहीं होता।
पांडवों के पांच शिशुओं का , रात के अंधेरे में धोखे और छल से , वध करने वाला अश्वत्थामा का मारा जाना युद्धिष्ठिर के सच बोलने से ज़्यादा जरूरी था।
ये झूठ है कि झूठ बोलना पाप है। आईये थोड़ा-थोड़ा झूठ बोलते रहें , ताकि सच कहीं बेरंग ना हो जाय , सच का संज्ञान कहीं लुप्त ना हो जाय।
नहीं , हर बार झूठ बोल रहे बच्चे को टोकिए मत कि वो झूठ बोल रहा है , क्योंकि झूठ से हम सबका वास्ता है।
कृष्ण ने रणनीति बनाई की अगले दिन के युद्ध में अश्वत्थामा नाम के हाथी को मारा जाय और प्रचार किया जाय कि द्रोण का बेटा अश्वत्थामा मारा गया।
सच बोलने के लिए मशहूर युद्धिष्ठिर ने इसे अनुचित माना और कृष्ण की बात माानने से अस्वीकार कर दिया। लेकिन उन्हें कृष्ण ने अपनी समझदारी से आधा सच और आधा झूठ बोलने के लिए राजी कर लिया।
अगले दिन हुआ भी वही। अश्वत्थामा हाथी मारा गया। और युद्ध लड़ते हुए द्रोण के कान तक बात पहुंचायी गयी कि उनका बेटा अश्वत्थामा मारा गया।
कृष्ण की कुटिलता से परिचित द्रोण ने समाचार के सत्यापन के लिए युद्धिष्ठिर से पूछा कि क्या सचमुच मेरा बेटा अश्वत्थामा मारा गया ? युद्विष्ठिर ने जवाब दिया ‘जी गुरूदेव, अश्वत्थामा मारा गया। ‘ कहानी के मुताबिक युद्धिष्ठिर के इतना कहते ही कृष्ण ने जोर से शंख बजाया और गुरू द्रोण युद्धिष्ठिर के कथन का उत्तराशं - ‘लेकिन नर नहीं, हाथी‘, नहीं सुन पाए।
इस बात पर अभी भी बहस हो सकती है कि युद्धिष्ठिर ने जो कहा वो सच था या झूठ ? विश्वास ना हो तो राम से पूछिए। वह चाहें तो दोनों बातें साबित कर सकते हैं। आप सहमत हों या ना , बला से। राम कौन ? राम जेठमलानी।
खैर, भारत की पौराणिक और धार्मिक कहानियों से पता चलता है कि अपने यहंा झूठ बोलने की लंबी परंपरा है। झूठ सच नामक सिक्के का दूसरा पहलू भर है। शायद कभी झूठ का अच्छा खास बोलबाला रहा होगा, ऐसा अनुमान सच के प्रति बाद के दूराग्रह को देखकर लगाया जा सकता है।
सच के साथ जुड़ी नैतिकता को अगर थोड़ी देर के लिए स्थगित कर दें तो इस बात से असहमत होना कठिन होगा कि झूठ बोलना एक रचनाशील काम है। आपमें कल्पनाशीलता और रचनाशीलता जैसे गुण नहीं हैं तो आप झूठ नहीं बोल सकते।
बच्चे इस बात के सबसे अच्छे उदाहरण हो सकते हैं। बच्चे झूठ नहीं बोलते , तब तक जब तक कि वे बोलना सीखने में व्यस्त रहते हैं। एक बार जब वे भाषा के सामान्य अर्थ और नीहितार्थ का भेद जान लेते हैं , फिर जम कर बोलते हैं। एक बच्चा के दिमाग की तीक्ष्णता , कल्पनाशीलता और रचनाशीलता का पता इस बात से लगाया जा सकता है कि वो अपने सच और भाषा के साथ कैसा खिलवाड़ करता है।
लेकिन हम बच्चे से सच बोलने की जिद्द करते हैं। अपनी बुद्धि का डंडा चलाते हुए हर बार बच्चे का झूठ पकड़ लेते हैं और कहते हैं - ‘नहीं , झूठ नहीं। झूठ से मुझे सख़्त नफ़रत है। तुम झूठ बोलोगे और मैं पकड़ लूंगा। खबरदार जो फिर कभी झूठ बोला।‘
सच बोलने की इस जिद्द के पीछे शायद हमारे बलवादी देवताओं का और उनके समर्थकों का हाथ है। सच
के ज्यादातर पैरोकार पौराणिक कहानियों के वे क्षत्रिय राजकुमार हैं , जो भले ही बलवान हों लेकिन उनकी बुद्धि की तीक्ष्णता संदीग्ध है।
राम से पहले राजा हरिश्चंद्र की कहानी हम जानते हैं। कहानी के मुताकिब हरिश्चंद्र शायद राम के पूर्वज ही थे। हरिश्चंद्र सत्य तो बोलते थे , लेकिन उनकी सत्यता आत्मघाती था और उसमें किसी किस्म की विलक्षणता का अभाव है। उनके यहां सत्य हठ बन जाता है। हरिष्चंद्र की कहानी भोंडे ढंग से नाटकीय और भावुक है। इतना नाटकीय है कि अविश्वसनीय है। जो इंसान सपने और जीवन के फर्क को ना समझ ना पाए , उससे और क्या उम्मीद कर सकते हैं !
सत्य के प्रति राम का आग्रह भी मूलतः उनके बल का आग्रह ही था। राम को अगर वाल्मीकि , कंबन , तुलसी , और रामानंद सागर जैसे कवि कहानीकारों का साथ नहीं मिला होता तो, हमें उनके सत्य प्रेम से ज्यादा उनके बल प्रेम के बारे में पता होता।
भारतीय देवताओं में ज्यादातर बाहुबली क्षत्रिय हैं , जिनके चरित्र में हास - परिहास और जीवन के रंग का भारी अभाव है। अपने अनुभव से हम इस बात को समझ सकते हैं कि अपने बल और सामथ्र्य में अंधा विश्वास रखने वाला कभी अपनी वाक्श्क्ति पर भरोसा नहीं करता। रामायण की कहानी में कोई ऐसा अंश नहीं है जब आप राम के वाक्चातुर्य से मोहित हो जांय। संक्षेप में राम बुद्धि के नहीं बल के देवता हैं।
ब्ुद्धि वाले सारे गुण कृष्ण में थे। इसलिए कृष्ण को झूठ से कोई परेशानी नहीं है। वह झूठ बोलते भी हैं और झूठ बोलने वाले को प्रश्रय भी देते हैं।
झूठ को पाप घोषित किए जाने के पीछे इन्हीं बलवादी देवताओं के समर्थकों का हाथ है। जो भी हो, झूठ के बिना दुनियावी इंसान का काम नहीं चल सकता। हम अक्सर झूठ का सहारा ऐसी ही परिस्थितियों में लेते हैं, जहां सच हमें मुश् िकल में डाल सकता है। झूठ की इस सामाजिक उपयोगिता को हम अस्वीकार नहीं कर सकते।
लेकिन विडंबना है कि झूठ का सहारा लेकर जीने वाले आप-हम जैसे तमाम लोग झूठ और झूठ बोलने वाले को कोसने का कोई अवसर नहीं छोडते। बात-बात में यह कहना कि ‘ये झूठ है , गलत है या फिर कि फलां आदमी पर विष्वास नहीं किया जा सकता क्योंकि वो झूठ बोलता है , झूठ और झूठ बोलने वालों की सामाजिक प्रतिष्ठा में बड़ी बाधा पैदा करती है।
जो लोग सच को सर पर लेकर घूमते हैं , वे भी बगल में झूठ की गठरी दवाए रखते हैं। हमारे यहां तो लोग झूठ की खेती करने का आरोप दूसरे पर लगाते हैं , लेकिन झूठ की फसल काट कर अपना गुज़ारा चलाते हैं।
अगर हम आज के सूचना युग और सूचना समाज को देखें तो यहां एक चीज जो सबसे ज्यादा झूठ बेची या खरीदी जाती है वह है झूठ। राष्टीय अंतराष्टीय स्तर के झूठ के कुछ नमूने देखिए: श्रीलंका के किसी चट्टान पर सीता के पद चिन्ह दिखाई देते हैं। साईवेरिया में कहीं दूसरे ग्रह के अज्ञात जीव का शव मिलता है। भारत दुनिया का सबसे आदर्श लोकतंत्र है। अमेरिका दुनिया में लोकतंत्र और शांति स्थापित करना चाहता है। ओसामा बिन लादेन शहीद हो गया। कांग्रेस की सरकार भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए कटिवद्ध है। भाजपा एक राष्टवादी पार्टी है। मायावती दलितों के उत्थान के लिए काम करती है। राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनने के लायक है। करुणा की कनी ने सिनेयुग के तोरानी से 200 रूपए कर्ज लिए थे। ये इस सूचना युग और समाज के ऐसे भोंडे सत्य हैं जिन्हें जन-संचार के उपलब्ध सारे माध्यम प्रचारित प्रसारित करने में व्यस्त हैं।
समस्या इन शर्मनाक भौंडे सत्यों से नहीं हैं। सच का जाप करते हमारे लोकतांत्रिक संस्थाओं से है। विद्यालय से लेकर न्यायालय तक और सड़क से लेकर संसद तक पिछले साठ सालों में सच की पूंछ पकड़कर राजा हरिश्चंद्र की ये संतानें आज यहां तक पहुंच चुकी है।
अगर हमने झूठ को , जीवन के रास रंग को , हास परिहास को अपने सार्वजनिक संस्थानों में थोड़ी सी इज्ज़त दी होती तो हमारा सच इतना लिजलिज़ा नहीं होता।
पांडवों के पांच शिशुओं का , रात के अंधेरे में धोखे और छल से , वध करने वाला अश्वत्थामा का मारा जाना युद्धिष्ठिर के सच बोलने से ज़्यादा जरूरी था।
ये झूठ है कि झूठ बोलना पाप है। आईये थोड़ा-थोड़ा झूठ बोलते रहें , ताकि सच कहीं बेरंग ना हो जाय , सच का संज्ञान कहीं लुप्त ना हो जाय।
नहीं , हर बार झूठ बोल रहे बच्चे को टोकिए मत कि वो झूठ बोल रहा है , क्योंकि झूठ से हम सबका वास्ता है।
Monday, June 20, 2011
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