Wednesday, August 10, 2011

अवसाद की इस घड़ी में अपमानित महसूस कर रहा हूं मैं।

पहले तो सोचा कि जाने दूं। कितनी ही बार तो ऐसी भावनाओं से गुजरा जो साझाा करने लायक थीं। मूलतः आलस्य और अन्यतः किसी दूसरे तात्कालिक दवाब में वे हाथ और दिमाग दोनों से जाती रहीं।

दरअस्ल दोपहर को अचानक धनराज का फोन आया था। धनराज एक मित्र हैं , जिन्होंने अब तक जितनी बार फोन किया था, मुनींद्र सिंह की वजह से ही किया था। मुनींद्र सिंह शहर में नहीं हैं। मैं भी मुबई से पिछले बीस पच्चीस दिन बाद लौटा था। फिर भी धनराज के फोन को मैंने सहजता से लिया। उन्होंने जिज्ञासा बस पूछा कि लाईब्रेरी कैंटीन की तरफ मेरा आना होता है इन दिनों कि नहीं? मैंने कहा, शाम में एक चक्कर मार आने की कोशिश करूंगा।

संजय कुमार के यहां जाते जाते मैं यह बात भूल गया कि धनराज से लाईब्रेरी कैंटीन पर मिलने की बात हुई है। हम लोग लाईब्रेरी कैंटीन तक गए भी। लेकिन तभी देवेंद्र का फोन आया और तय हुआ कि गंगा ढाबे पर मिला जाय। हम लोग गाड़ी से बिना उतरे गंगा ढाबे लौट आए।

ढ्राबे पर राघवेंद्र सिंह और ज़ुल्फी के साथ वही भ्रष्ट राजनीति और पतनशील काग्रंस पार्टी की बातें की। देवेंद्र को किसी पार्टी में जाना था। वो ढाबे नहीं आए। संजय के साथ मैं घर लौट आया।

करीब दस बजे के करीब सरोज का फोन आया। प्रारंभिक औपचारिक बातों के बाद उन्होंने बताया कि मुनींद्र सिंह लौट आए हैं। यह खबर धनराज ने उन्हें बतायी थी।

मैं थोड़ा चैंका। मेरे चैंकने में जिज्ञासा का भाव कम था कि वो क्यों लौट आए, खुद के सही साबित होने का दंभ अधिक था कि उन्हें लौटकर ही आना था।

यहां मुनींद्र सिंह के बारे में थोड़ा लिखना जरूरी है। मुनींद्र सिंह जेएनयू के कुछ उन विरले छात्रों में से हैं , जो ज्ञान की तलाश में अपने विषय और अनुशासन की हदें तोड़ते रहे हैं। भले ही उसका कोई भी खामियाजा उन्हें क्यों ना भुगतना पड़े। वह 1997.98 की सितंबर की उमस भरी कोई शाम थी, जब कुछ सामान्य मित्रों के माध्यम से मुनींद्र सिंह से मेरी मुलाकात हुई। शायद संजय झा पहले मित्र थे , जिन्होंने मुझे मुनींद्र सिंह की राजनैतिक परियोजना के बारे में बताया था। फिर मुनींद्र सिंह से मिलने का सिलसिला चला और चलता रहा। वह एक दिलचस्प आदमी हैं। आपको उनकी ज़्यादातर बातें पसंद आएंगी अगर आप उनकी कुछ बातों को अनसुना करने की आदत डाल लें।

जेएनयू छोड़ने के करीब दो साल ढाई साल बाद मुझे मुनींद्र सिंह एक दिन गुरूद्वारा रकाबगंज रोड पर मिले। मैंने उनसे पूछा कि उनकी राजनैतिक परियोजना की क्या प्रगति है ? उन्होंने मुझे एक पत्रिका का अंक दिखाया और बताया कि परियोजना चल रही है और ये पत्रिका उसीका एक भाग है। उन्होंने मुझे उस पत्रिका का मुंबई में कुछ लोगों को सदस्य बनाने की जिम्मेदारी दी , जिसे मैं पूरा नहीं कर पाया।

मुंबई से जब कभी दिल्ली आता मुनींद्र से मुलाकात गाहे बगाहे होती रही। पिछले एक डेढ़ सालों से मेरा मुबंई प्रवास काफी अनियमित रहा। इन दिनों ज़्यादातर समय मेरा दिल्ली में ही गुजरा। आप अगर जेएनयू के पीछे वसंतकुंज में रह रहे हों और कोई नियमित काम भी नहीं कर रहे हों, फिर जेएनयू आने जाने से बचना कितना मुश्किल है, यह समझ सकते हैं। पिछले डेढ़ साल में मेरा जेएनयू आना जाना कुछ ज्यादा ही बढ़ गया। मुनीद्र के साथ और उनके माध्यम से कई नए दोस्तों से मुलाकात हुई। धनराज इसी अर्थ में मुनींद्र को पहले और मुझे बाद में जानते हैं। धनराज के अलावा शैलेंद्र, दिनमणि , शादाब , उज़ैर आदि कई ऐसे महत्वपूर्ण लोगों को मैं नहीं जानता अगर मुनींद्र नहीं होते।

खैर, अपनी पीएचडी पूरी करने के बाद देवेंद्र भी देश लौट आए थे और हम सब में वर्तमान राजनीति को लेकर भारी वितृष्णा और क्षोभ गहराया हुआ था। था क्या, बल्कि है। जनवरी के महीने में देश के चैदह गणमान्य नागरिकों ने प्रधानमंत्री के नाम एक खुली चिठठी लिखी और छपवायी थी जिसमें भ्रष्टाचार के अलावा सरकार के प्रति लोगों की लगातार कम होती आस्था के बारे में चिंता जताई गयी थी।

यह विचार भी मुनींद्र सिंह का ही था कि गणमान्य नागरिकों की इस चिटठी के जवाब में देश के चैदह सामान्य आदमी की एक चिटठी भेजी जाय। यह तय हुआ कि इस लंबी चिटठी में हम वर्तमान औपरिवेशिक राजनीतिक ढांचा पर सवाल उठाएंगे और इसे आमूलचूल बदलने की बात करेंगे। चिटठी लिखी गयी। उसे हर संभव जगह छपने और प्रसारित होने के लिए भेजा भी गया।

पर किसी अखबार, टीवी वाले ने चिटठी छापने की जहमत नहीं उठायी।

खैर, शैलेंद्र की कोशिश से इस बीच मुनींद्र की भेंट राजनैतिक आकांक्षा रखने वाले एक खास सज्जन से हुई। उसे मुनींद्र सिंह की राजनैतिक परियोजना की बात जंची।

उस सज्जन से मिलने मुनींद्र, शैलेंद्र, देवेंद्र और मैं पालम विहार गए। मीटिंग में ये तय हुआ कि हम सब मिलकर इस परियोजना को सफल बनाने की कोशिश करेंगे।

काम शुरू हुआ। हमें आॅफिस दिया गया। हमारी ज़रूरतों की सारी चीजें मुहैया करायी उसने। सिवा एक गाड़ी की। जिसकी बात हुई थी कि दिल्ली से आने जाने वालों के लिए एक गाड़ी उपलब्ध रहेगी। राकेश से जब मैंने गाड़ी की बात की तो उसने दो टूक शब्दों में बताया कि इस परियोजना में जिसे काम करना है , वो यहां रहकर करेगा। राकेश को ये लग रहा था कि इस परियोजना में मुनींद्र सिंह के अलावा किसी और की उसे कोई जरूरत नहीं है। जब मुनींद्र यहां रहेंगे तो किसी और की क्या जरूरत है !

इस बीच कुछ और बातें हुई जो थोड़ी बहुत हम सबको नागवार गुजरी। मुनींद्र के एक पूराने मित्र हैं जीत - संबुद्धो चक्रवर्ती। जीत को मैं भी जानता हूं - मुंबई में आलोक और ये साथ रहते थे कभी। जीत के जुड़ने के बाद उसकी पत्नी भी जुडीं। ये तो अच्छी बात थी। लेकिन पता चला कि आॅफिस के दो बेडरूम में से एक जिसे हम अपना वार रूम बनाने वाले थे उसमें जीत और उसकी पत्नी रहेगी। एक कमरा तो मुनींद्र के लिए था ही। दूसरा जीत और उसकी पत्नी के लिए आरक्षित कर दिया गया। मतलब आॅफिस के नाम पर आगे का बैठक खाना छोड़ दिया गया।

मुनींद्र के कुछ रवैये से मुझे तकलीफ हुई और मेरा मतभेद शुरू हो गया। सात जून की शाम को उनके साथ फेान पर आखिरी बात हुई। उन्होंने मुझे यह अहसास दिलाया कि यह उनके अकेले की परियोजना है और इसमें उन्हें मेरी कोई जरूरत नहीं है।

मैं भला कब चूकने वाला था! मैंने भी कुछ अप्रिय शब्द कहे और हमारी बातचीत बंद। इस बीच मुझे मुनींद्र की खबर मिलती रही। जो उनसे मिलने जाते, वे आकर बताते कि वहां क्या हो रहा है , क्या नहीं! सच मानिए, मैं उदासीन बना रहा इस परियोजना और मुनींद्र को लेकर। जब कभी इसके बारे में सोचा तो यही सोचा कि ऐसा करना संभव तो है, लेकिन मुनींद्र और जीत जैसे लोगों से नहीं।

सरोज से बात होने के बात धनराज से जब मैंने दुबारा पूछा कि मुनींद्र क्यों वापस आ गए तो धनराज ने बताया कि उनकी परियोजना इतनी बड़ी है और राकेश की आकांक्षा इतनी छोटी कि दोनों बेमेल हो रही थीं।

मुनींद्र वापस लौट आए हैं। लगभग पंद्रह दिन बाद वो मुंबई हैदराबाद और भोपाल की यात्रा करेंगे-किसी बड़ी राजनैतिक आकांक्षा वाले आदमी की तलाश में।

एक व्यक्ति के रूप में मुनींद्र की क्षमता पर मेरा शक्क गहरा गया है। भारत को लेकर उनके देखे गए सपने महान हैं। लेकिन उन सपनों को हासिल करने लिए जिस इस्पाती संकल्प और व्रत की जरूरत है, वो मुनींद्र सिंह में नहीं बचा। या है भी तो मैं नहीं देख पा रहा हूं।

मैं चाहता हूं कि मुनींद्र कुछ ऐसा करंे कि मेरा कहा सब झूठ और बकवास साबित हो जाय।

मुनींद्र सिंह के लौट आने पर आए बचकाने दंभ पर मुझे खेद है। मोर्चे से लौट आना एक अपमानजनक स्थिति होती है। मुनींद्र का लौट आना भी एक अवसादपूर्ण स्थिति है। अवसाद की इस घड़ी में स्वयं मैं भी अपमानित महसूस कर रहा हूं।


श्याम आनंद झा

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