खुज़ली एक बीमारी है। कुछ लोगों के लिए एक सुखद बीमारी। आखों पर पलकों का आधा परदा डालकर खुजलाते रहने वाले ये लोग इस बात से वाकिफ़ मगर बेपरवाह होते हैं कि इनकी ये मीठी खुजलाहट जल्द ही जलन में बदलने वाली है।
अभी कल तक हमारे समाज में कुछ लोग ऐसे थे, जो आपको टोकते, आगाह करते कि खुजली एक घटिया बीमारी है, कि खुजलाना सुख बटोरने का कोई तरीका नहीं है।
लेकिन अचानक हमारा समाज इतना शिष्ट और शालीन हो गया है कि आज आपको अपने किसी काम या कदम पर कोई रोकने टोकने वाला नहीं मिलेगा। बल्कि आप ऐसे लोगों से अपने को हमेशा घिरा पाएंगे जो आपको आपके हर एक काम पर प्रोत्साहन देते मिलेंगे, चाहे आप सबके सामने आंखें बंदकर खुजली ही क्यों ना रहे हों। वे कहेंगे, जी हां, जहां सुख इतना दुर्लभ हो, वहां अगर कोई खुजलाते हुए ही सुख बटोर रहा है तो वह क्या ही अच्छा काम कर रहा है!
वर्तमान कला और उसकी समीक्षा परिदश्य को देखकर तो कम से कम ऐसा ही लगता है।
अभी पिछले से पिछले हफता एक फिल्म रिलीज़ हुई ‘डेल्ही बेली‘। इस फिल्म को लेकर जो उत्तेजना सिनेमा समीक्षकों के बीच दिखी वह चैंकाने वाली भी है और काफी रहस्यमयी भी। सच पूछिए तो, इन समीक्षकों में इस तरह के जोश-खरोश देखकर भ्रम होने लगता है कि कहीं फिल्म समीक्षा भी प्रायोजित कार्यक्रम का एक अंग तो नहीं बन गयी है?
यह फिल्म फिल्म नितिन बेरी (कुणाल राय कपूर) की टट्टी और सोमयाजुलू के हीरे की उलटफेर के आस पास घूमती है। नहीं, कहानी के विस्त्ृत व्यौरे में जाने की ज़रूरत नहीं है। क्योंकि अगर आपने देख ली है तो, और अगर नहीं देखी है तो, कहने लायक इस कहानी में कुछ है नहीं। और, वैसे भी हम फिल्म पर बात कर रहे हैं इसकी कहानी पर नहीं।
फिल्म में सबसे पहले तो यह स्पष्ट नहीं है कि ब्लादिमिर हीरे का पैकेट जो उसे सोमयाजुलू तक पहुंचाना है, सोनिया को क्यांे देता है? सोनिया ब्लादिमिर और सोमयाजुलू के लिए काम करती है, इसकी कोई भनक फिल्म आपको लगने नहीं देती। अगर मान लेते हैं कि सोनिया ब्लादिमिर के लिए काम करती भी है तो वह इतने महत्वपर्ण कन्साईनमेंट अपने एक ऐसे लापरवाह दोस्त को कैसे दे सकती है, जिसे वो इतने अच्छी तरह से जानती है कि उसके साथ सोती है, और उससे शादी करने वाली है।
आगे हम देखते हैं कि सुबह का वक्त है और तीन दोस्त घोड़े बेच कर सो रहे हैं। नितिन बेरी (कुणाल राय कपूर) तो इतनी बेसूधी सो रहा है कि उसकी चडढी नीचे सड़क गयी है और उसके पिछवाड़े का ऊपरी भाग दिखाई दे रहा है। एक सोते हुए आदमी का चडढी से झांकता पिछवाड़ा सिनेमा के लेखक और निर्देशक को इतना लुभावना लगा कि एक ही सीन में कम से कम इसके तीन शाॅट हैं।
निस्संदेह, दर्शकों के बीच से कुछ दबी हुई सी हंसी भी सुनाई देती है आपको। नहीं, आप चैंक कर दाएं बाएं या पीछे मुड़कर अंधेरे में इन दबकर हंसने वाले को पहचानने की कोशिश नहीं कर सकते, कि कौन हैं ये लोग जिन्हें आदमी के शरीर के किसी विशेष भाग को देखकर हंसी आ रही है! चारों तरफ अंधेरा है, और हर दर्शक चेहराहीन है।
चलिए, आगे बढ़ते हैं। दरवाजे पर खट-खट की आवाज़ होती है। तीनों में से कोई उठने को तैयार नहीं है। अंत में तिशा (इमरान खान) उठता है और वह अपने दोनों दोस्तों के पिछवाड़े पर एक एक लात लगाता है कि वे क्यों नहीं उठे, कि उसे क्यों उठना पड़ा!
तिशा की लगायी गयी लात खीज़ में कम मुहब्बत में लगायी गयी ज्यादा है, इतना तो मैं भी समझता हूं। लेकिन उसने लात लगायी क्यों? मुहब्बत जाहिर करने का यह कौन सा तरीका है?
फिल्म के लेखक-निर्देशक ने शायद सोचा होगा कि इससे यह साबित हो जाएगा कि तिशा फिल्म का हिरो है। लेकिन इसकी क्या ज़्ारूरत थी?
फिल्म के निर्माता आमिर खान हैं, और उनमें उनका भांजा इमरान काम कर रहा है। फिर भी किसी को ये उम्मीद कैसी करनी चाहिए कि वीर दास या कुणाल राय कपूर या कोई और फिल्म का नायक हो सकता था!
नहीं ठहरिये, मुझे याद आ रहा है कि दर्शकों को फिल्म का यह सिक्वेंस भी अच्छा लगा था। वे हंसे थे, इतना तो मैं निश्चियपूर्वक कह सकता हूं। क्यों हंसे थे, यह मैं नहीं जानता।
परंत,ु मैं इतना जानता हूं कि इस फिल्म के आस पास गुजरे जमाने के भांड की तरह शोर मचाने वाले सिनेमा-समीक्षकों को भी यह सिक्वेंस अच्छा लगा होगा। दर्शकों से तो नहीं, पर समीक्षकों से यह पूछने का हक तो मैं रखता हूं कि उनसे पूछूं, इस सिक्वेंस पर आप हंस थे, तो क्यों? और नहीं हसे थे, तो इसके बारे लिखा क्यों नहीं।
खीज़कर पलटवार करते हुए कोई यह कह सकता है कि दोस्तों के बीच ऐसा होता है। मैं भी मानता हूं कि ऐसा होता है। हमारी देखी और जिअी दोस्ती में भी ऐसा हुआ है। हमने दोस्तों को मारा है तो उससे मार खाया भी है।
मगर नहीं। फिल्म में ऐसा कुछ नहीं होता है। तिशा अपने दोस्तों के पिछवाड़े पर लात मारता है लेकिन उसके पिछवाड़े की तरफ कोई आंख उठाकर भी नहीं देखता।
वर्चस्व की लड़ाई कहां तक पैठ चुकी है! पति-पत्नि के संबंध पदरे पर आज भी तिरछा ही दिखाया जाता है। अभी पीछे की कुछ हिंद फिल्मों में नायक के दोस्त, दोस्त कम चापलूस ज्यादा नज़र आते हैं। ये नहीं जानते, जिन्हें ये दोस्त समझ रहे हैं, वे दोस्त नहीं चापलूस हैं। दास्ेती से ताल्लुक रखने वाली पहले की फिल्मों में ऐसा नहीं होता था। वहां रिश्ते में दोनों या सब बराबर होते थे।
इस फिल्म में तिशा बाकी के अपने दोस्तों से विशिष्ट कैसे है, यह स्पष्ट नहीं है। वीरदास और कुणाल राय कपूर का एक जैसा दिखाया गया है, जबकि तिशा इनके साथ , लेकिन इनसे अलग रूप में पेश किया गया है।
‘डेल्ही बेली‘ एक खराब फिल्म है यह साबित करने की इज़ाजत मुझे अपने ब्लाॅग का फारमेट नहीं देता। हम दर्शकांे पर भी दोष नहीं देते कि उनकी अभिरूचि में ऐसा पतन क्यों देखने को मिलता है? लेकिन हम अपने समीक्षकों से तो यह पूछ सकते हैं कि प्रशंशा के पुल बांधने से पहले वे फिल्मों की बारीकियांे की ओर ईशारा क्यों नहीं करते?
संभव है कि वे फिल्मों के इन कमज़ोर पक्षों के बारे में जानते हों, पर किसी दबाव में ऐसा कहने से हिचकते हों?
स्ंाभव यह भी है वे इन भेदों को नहीं जानते!
वेवज़ह गाली देने वाले इंसान को हम ज़्यादा साहसी नहीं कहते। फिल्म में वीरदास का गाली या इससे संबंधित शब्द बोलना हर बार बेतुका है।
आपने गौर किया, फिल्म में इमरान एक बार भी इस तरह के शब्द का इस्तेमाल नहीं करता। नहीं ये अच्छी बात नहीं है। फिल्म में जो दो सबसे व्यस्क दृष्य हैं, उनमें भी इमरान के इमेज को बचाने की शर्मनाक कोशिश हुई है। दोनों ही दृष्यों में फिल्म की नायिकाओं ने हिम्मत दिखाई है, और फायदा ईमरान को मिला।
और ये पांचवी फेल टाईप का गीत ‘‘भाग डीकेबोस‘‘!
ये सब क्या है ?
लोग ऐसी चीजें पसंद कर रहे हैं, क्योंकि उनकी आंखें और कानें सप्ताह भर से खुजला रहे हैं। कुछ भी सुनाईये, कुछ भी दिखाईये, उन्हें पसंद आएगा। थोड़ा समीक्षकों का थोड़ा शोर शराबा हो जाय तो कहना ही क्या!
आप इससे अन्यथा सोचते हों तो बताएं।
श्याम आनंद झा
Monday, July 18, 2011
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3 comments:
good Mr. Jha.
What else do you expect from 'Bombay Cinema' except to sell you rotten food packaged glamorously and peppered with hot spice as the Macs do in Delhi all the time??? And why do you expect the audience and the 'critics' to be critical and use their powers of reason when they are just busy doing things which they are not and are even not capable of. They are busy handling 'jobs' because it gets money along with fame and opportunities of different kinds as they come in one's way in 'farmhouse parties'. Madhur Bhandarkar has brilliantly captured it all in 'Page 3'. I presume you will agree with me that it is all an industry. As far as the audience are concerned,their chief preoccupations hover around wearing clothes that do not fit them, speaking a language that make them appear as clowns. In short, aping the west.The saving grace is, or I presume it to be, that they are not trying to imitate the postures and positions of porn stars from from pornographic films. I say so because Spinal Injuries Center's business has not zoomed yet. They are still struggling to cope up with other 'medical shops'. Films, according to me, are no more works of art borne out passion and commitment but have become business ventures. And it is time that the mask of so called 'commitment', 'sensitivity' and ''perfectionism' be removed from the face of Aamir Khan. He is no different than a film salesman who happen to be innovative in selling the 'rotten' in the market.
10 years back giving a normal kiss on cheek was more than enough to attract enough crowd but now lip kiss after every 15 mins does not leave impact. Bikni is a national uniform on screen and bed scene sorry intercourse with torso movement(without showing two major parts), is family viewing just you need to have Alphabet U/A.
Thanks to Asha Parekh who is showing light to new generation. My 5 years daughter was asking me that why do not you hug and kiss as Shila do(She calls Kathrina Shila) . Do not you love mother?
How she took over on sensor board hope u remember from Arvind Trivedi (Trivedi is putting vulgarity in screen).
In name of creativity you get license to sell / show anything and we call it modernization. If this creativity then go to slums you will see such creativity by all 4 yrs to 20 years kids that will sell like a hot cake.
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