Tuesday, August 2, 2011

अभिरूचि ही नहीं हमारी स्मृतियां भी गुलाम हैं।

शायद ही हम में से कोई अपने गांव या कस्बे को लेकर कभी इस प्रश्न से जूझता है कि वे हमें पसंद हैं कि नहीं? अमूमन वे हमें पसंद होते हैं। ज़्यादा लोगों को कुछ ज्यादा ही। ऐसे लोग हर बार, पहली बार के मुकाबले इन गुज़रे ज़माने की और ज्यादा रुमानी तस्वीर उकेंरते हैं।
अतीत में एक दुर्निवार आकर्षण होता है। जो कुछ भी बीत गया, छूट गया, उसे ना भी पाना चाहें तो भी उसके आस-पास घूमना या रहना अच्छा लगता है। अक्सर नशे में और कभी कभी बिना नशे में, हम इन बीते, छूटे, और टूटे हुए जगहों और वक्तों और इंसानों को याद करते हैं।
हम याद करते हैं कि स्कूल से आते वक्त गन्ना कैसे चुराए थे, आम कैसे तोड़े थे। हम याद करते हैं कि कैसे लड़ने के बावजूद दोस्तों से लड़ाई नहीं होती थी। हम याद करते हैं कि हम किस किस पर मरते थे और कौन कौन हमसे चिढ़ते थे।
ऐसे समय में जब किसी के लिए किसी के पास समय नहीं है, हम अपने लिए निकाले गए थोड़े से समय में अतीत के उन कोनों को टटोलते नज़र आते हैं जो हमारा इतना अपना है कि उसमें चाहें तो हम थोड़ा बहुत संशोधन भी कर सकते हैं। और किसी को पता भी नहीं चलता।
मिशाल के तौर पर गुलज़ार। गुलज़ार अपने ज्यादातर गीतों में हमें ऐसे ही खोये हुए संसार की झलक दिखाते हुए मिलते हैं, जिसमें अतीत इतना करीब और मांसल दिखता है कि मन करे - जाकर छू लें। और गुलज़ार ही क्यों, ऐसा तो कईयों ने किया है। गुलज़ार का नाम इसलिए जबान पर चढ रहा है क्योंकि वे इस कला में सबसे ज्यादा माहिर हैं।
नहीं, ऐसा नहीं है कि गुलज़ार का अतीत उतना ही गुलज़ार रहा होगा जितना कि उनके गीतों में दिखता है। बल्कि ज़्यादा संभव यह है कि उनके गांव, उनके बचपन या उनके अतीत में ऐसी कई बातें हुई होंगी जिन्हें वे याद नहीं करना चाहते। याद नहीं करना चाहते क्योंकि उससे कोई फ़ायदा नहीं है - मुहाबरे के अर्थ में नहीं, ठोस पेशेवर हिसाब-किताब की नज़र से।
लेकिन गुलज़ार के बारे में बात करने वाला मैं कौन होता हूं - खासकर उनके बचपन या उनके गांव या उनके अतीत के बारे में?
लेकिन अपना जिक़्र तो मैं कर ही सकता हूं। मेरा भी एक गांव है। मेरा भी बचपन था। और मेरी भी स्मृतियां हैं। दोस्तों के साथ या अकेले, नशे में या बिना नशे के, मैंने भी उन जगहों, लोगों और संदर्भों को याद किया है जो गुजर चुके हैं। और अक्सर ऐसे मौंकों पर मै भी काफ़ी सजग रहता हूं, दूसरों की तरह कि किसी भी क़ीमत पर गांव की रुमानी छवि कायम रहे।
गांव के अलावा जिस एक और जगह जिससे मुझे बेइम्त्हां मुहब्बत है वह है शहर मुंबह। मुंबई और मेरे गांव दोनों में कई ऐसी बातें हैं जो मेरे व्यक्तित्व के करीब बैठती हैं। ये एक अलग विषय है और इस पर स्वतंत्र चर्चा फिर कभी की जाएगी।
अभी कल शाम मैं अपने एक मित्र के साथ जुहू चैपाटी गया। नहीं, शाम नहीं, बल्कि रात थी। 11 से उपर बज रहे थे। आईसक्रीम खाते हुए हम दोनों किनारे तक आती लहरों से बचते हुए टहलने लगे। ये सोमवार की रात थी, इसलिए सप्ताहंत वाली भीड़ नहीं थी। भूटटे और चिप्स बेचते कुछ हाॅकर्स थे और बेहद बीमार सी दिखने वाली कई वेश्याएं।
हम लोग जेडब्लू मैरियट के पीछे रेत में फंसी एक बीएमडब्लू में सवार परेशान लोगों की मूर्खता पर हंस रहे थे। आस पास की वेश्याएं हर बात से बेखबर समंदर की लहरों को सूनी निगाहों से घूर रही थी। और अचानक मुझे अपना गांव याद आ गया।
मेरे गांव में वेश्याएं नहीं हैं। सेक्स संबंधी बीमारी के उपचार के लिए हकीमांें और बाबाओं के करामात की कहानियां भी आपको इधर नहीं मिलेंगी। सेक्स को लेकर कोई कुंठा या दंभ, सच मानिए, इस इलाके में आपको नहीं मिलेगा।
लेकिन मुझे याद है कि मैंने अपने गांव में सूनी निगाहों से आसमान, वृक्ष या बकरी को निहारते हुए लोगों को देखा है। मैंने ऐसी गरीबियां देखी हैं, जिन्हें यादकर मुझे डर लगता है। कई ऐसे लेाग थे, जिन्होंने शायद सालों साल भरपेट खाना नहीं खाया होता था। मैं उन्हें जानता था। मुझे अब तक उनके नाम याद हैं।
ये लोग पेट पर गमछी बांध कर भूख से लड़ते थे। और कभी-कभार आम और कटहल की चोरियां करते, कभी कभार पकड़े भी जाते। चूंकि चोरी करना पाप है। इसलिए इन्हें छोटी मोटी सजा भी दी जाती थी।
बीमार और काम करने की उम्र पार कर जाने के बावजूद ग्राहकों का इंतज़ार करती ये वेश्याएं और जिंदगी भर भूखे रहने वाले हमारे गांव के मज़दूर शायद ही हमारे स्वर्णिम अतीत का भाग बन पाते हैं।
ऐसा क्यों होता है? ऐसा इसलिए होता है कि हमारे आस पास की सांस्कृतिक संस्थाओं में हमें बताया गया कि अच्छी स्मृति क्या होती है। अच्छी स्मृति वही होती है जो बिकाउ होती है। अच्छी स्मृति होती हैं वे जो सुखी आदमी को परेशान ना करे। मीठी नींद के लिए हलके और हल्की लोरियां सुनाए।
हमारे समय के सारे महान बौद्धिक और रचनात्मक लोग आजकल इसी काम में लगे हैं। प्रसून जोशी नया सितारा है। आकाश के चंाद अभी भी गुलज़ार हैं।
और इनके देखा देखी और सुनी सुनायी हम भी उसी रास्ते पर बढ रहे हैं। हमारी पुरानी बातों में यात्रा के दौरान मिलीं वे सुंदर स्त्रियां होती हैं जो अपने पति और अपने बच्चे के साथ यात्रा पर इसलिए निकली थी कि आप से उसकी मुलाकात हो जाय।
टेन में खिलौना बेचती बूढी और लाचार औरत के बारे में हम कितनी बार सोचते हैं कि वह दिन भर में कितना कमाती होगी, कि इस बूढ़ापे में भीख मांगने वाले ये लोग कितने लाचार हैं!
बंबई हो या ब्रहमपूरा ये इतने ही रूमानी हैं जितना कि हम इन्हें देखना चाहते हैं!
क्यों ना हम अपनी स्मृतियों में थोड़ी जगह उनको भी दें, जिनके लिए कहीं कोई जगह नहीं है।


श्याम आनंद झा

2 comments:

Rahul said...

pichle blog mein aap srilal shukla baney they..is baar aap premchand evam glulzaar key mix lage!
Kabhi Kabhi yaad kar lia kijiye!
Rahul Tripathi
Goa

Rajeev said...

Jaha tak mai aapko piiche jakar dekhta hu Aapne JNU aur Ganga dhaba ko yaad nahi kiya jo shayad aapke jiwan me sabse jyada mahatwa aur smitiya rakhta hai. Juhu, Mumbai aur we aurte sab sahi hai par un aurto ko aap Brahampura me dekh na sake ya bhula dena chaha(मेरे गांव में वेश्याएं नहीं हैं। )?
Sawarn log shaam dhalte hi in bastiyo me ghumne nikalte the, kal ke liye majdoor jutane ke bahane. Ise aap waishya vritti nahi kah sakte par sawarno ka waishya vritti hi to tha jo ki bahubal ki wajah se daba rahta tha.

Ek baat aur ye smritiya hame jaroor gudgudati hai par koi un se jaa ke pooche jo aaj bhi usi jagah hai jinke liye ye smritiya nahi jindgi hai.
अच्छी स्मृति वही होती है जो बिकाउ होती है। अच्छी स्मृति होती हैं वे जो सुखी आदमी को परेशान ना करे।
Aap ke saath us toote hue lakri ke pul (jo ab cement ka hai)par bitae waqt aur cricket ki shuruat ko mai bi jaroor yaad karta hu.