Wednesday, June 29, 2011

क्योंकि, मनुष्य एक प्रचारवादी प्राणी है।

फेसबुक पर कई मित्र अपने नवजात शिशु की तस्वीरें लगाते हैं - सोते हुए अबोध की अनजाने में ली हुई तस्वीरं।
उन तस्वीरों पर बधाई और बधाईनुमा टिप्पणी देने वालों की संख्या और उत्साह देखकर मन में एक हूक सी उठती है - इतने सारे शिशु-प्रेमी एक साथ! साधुवाद!

बधाईयों और प्रशंसा से गदगद ये मित्र अपने शिशुओं की प्रगति की फिर माहवार तस्वीर लगाते हैं। और उन्हें माहवार बधाईयां मिलती जाती हैं। और ये सिलसिला जारी रहता है।

लोग अपने घरों की, अपनी गाडि़यों की अपने बीते लमहों की तस्वीरें लगाते नहीं थकते। और उनकी उन फोटो और टिप्पणियों पर वाह वाह करते उनके मित्र भी नहीं थकते।

मेरे दिल का हूक टीस में और टीस दर्द में बदलता रहता है।

कई बार मन किया कि अपने मित्रांे को टोकूं, ‘भाई साहब, जिसकी तस्वीर लगा रहे हो, उससे एक बार पूछ तो लो।‘ लेकिन कुछ खास मित्रों की सलाह और सामाजिक शालीनता के कारण टोकने की अपनी ललक को टालता रहा।

पिछले कुछ दिनों में औपचारिक बधाईयां लेने देने की गतिविधि इतनी ज्यादा बढ गयी है कि आप कुछ भी कीजिए , उसके बारे में बताईये ज़रूर। जैसे कि आपने पकोड़ा खाया तो, बताईये कि आपने पकोड़ा खाया। और उम्मीद कीजिए कि आपके मित्र आपके पकोड़े खाने पर आपको बधाई देंगे।

बधाई के इस कारोबार में मैं खुद को हमेशा किनारे पर ही पाया। मैं पकोड़े खाने जैसी चीज पर बधाई देने में हिचकता हूं। मैं इस बात पर भी बधाई देने में हिचकता हूं कि आपक आप वसंतकुंज से उठकर पहाड़गंज चले गए या जयपुर चले गए या फिर बंगलादेश और अमेरिका ही क्यों ना चले गए।

मुझे लगता है मनुष्य एक विचरणशीलप्राणी है और इन बातों के लिए बधाई देना वैसा ही होगा जैसे किसी बच्चे को उसके हंसने या रोने के लिए बधाई दी जाय।

लेकिन हमारे कई मित्र ऐसे हैं जो आपके थैले पर लगे एअर टैग देखकर बधाई देने के लिए तैयार हो जाएंगे ‘‘बधाई हो, आपने हवाई यात्रा की है !‘‘

मैं सोचता रहा कि बधाई देने लेने वाले ये लोग ऐसा क्यों करते हैं, इतना शोर क्यों मचाते हैं ? आप एक घटिया सी कहानी, घटिया सी कविता या घटिया सी फोटो खीचिए और चिपका दीजिए फेसबुक पर। और देखिए बधाईयुक्त टिप्पणियों की झड़ी!

संभव है बधाईयों से मेरी चिढ़ इसलिए भी हो कि मुझे अपने किए धरे के लिए कभी कुछ खास बधाई नहीं मिली है। मेरे सबसे करीबी संबंधी और मित्रों का मानना तो ये है कि मैंने अब तक कुछ ही नहीं तो बधाई किसी बात की। इन दोनों बातों में सत्यता है।

फिर भी, कुछ बातें बल-धकेल।

एक प्राणी के रूप में आदमी की कई विशेषता बताई गयी है। जैसे, मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, मनुष्य हथियार बनाने वाला प्राणी है, मनुष्य भाषा का प्रयोग करने वाला प्राणी है, मनुष्य आध्यात्मिक प्राणी है, आदि और इत्यादि।

आदमी के इन वैशिष्ट्य को बताने वाले इन विद्वानों ने, जाहिर तौर पर कई शोध और प्रयोग किए, तब जाकर वे अपने-अपने निष्कर्ष पर पहुंचे।

लेकिन बिना प्रयोग के, सिर्फ अनुभव के आधार पर , और इसमें सन्निहित सारे खतरे को उठाते हुए, यह भी कहा जा सकता है कि आदमी एक प्रचारवादी प्राणी है।

इस पृथ्वी का दूसरा कोई प्राणी अपने होने, करने, लेने, देने, जीने, मरने - मतलब कि ‘ने‘ से खत्म होने वाले जितने भी कर्म-कुकर्म हैं, का जितना ढिंढोरा आदमी पीटता है, कोई दूसरा प्राणी नहीं।

इस छोटी सी बात को साबित करने के लिए ज़्यादा मशक्कत करने की जरूरत नहीं है। एक कुत्ता या दुनिया का कोई भी दूसरा जीव अपने पैदा होने से लेकर मरने तक सारा काम बिना ढिंढोरा पीटे करता है।

अभी हाल तक आदमी भी ऐसा ही करता था। उसे इतना पता था कि व्यक्तिगत स्तर पर कौन सी सूचना छिपाने लायक है और कौन सी बताने लायक। इतना ही नहीं, उसे ये भी पता था कि कौन सी सूचना किससे छिपायी जाए और कौन सी किससे बतायी जाय।

लेकिन सूचना क्रांति की आंधी में आदमी की ये समझ हवा हो गयी। आज हम सब अपनी-अपनी दुकान सजाये बैठे हैं अपनी-अपनी सूचना बेचने के लिए। जो सूचना जितनी ताजा, निजी, और व्यक्तिगत होगी, उसकी क़ीमत उतनी ही ज़्यादा।

हर दृष्टि से पुरुष की निजता मुकाबले स्त्री की निजता एक ज्यादा गंभीर विषय है। इसलिए खुल्लम खुल्ला सूचना के इस युग में स्त्री की निज़ता के बहाने, आईये, सूचना की प्रकृति और प्रारूप को देखें।

ऐश्वर्या राय सूचना समाज़ की पहली स्त्री नहीं है , जिसके गर्भवती होने की खबर से हम सब बाखबर हैं। ऐश्वर्या से पहले भी कई नामी गिरामी हस्ती गर्भवती हुईं। अभी हाल में कार्ला ब्रूनी के गर्भवती होने की खबर आयी। उससे पहले डेमी मूर के बारे में तो हम सब जानते हैं ‘जिन्होंने गर्भ के नौंवे महीने में अपनी निर्वस्त्र तस्वीर खिंचवाईं थीं।

गर्भवती होना स्त्री के लिए एक स्वाभाविक स्थिति है (आजकल तो कुछ हिम्मतवर पुरुष के लिए भी)।
शायद ही कोई ऐसी स्त्री होगी, जो अपनी इस स्थिति को अपने आस पास के लोगों से छिपा पाती होगी। लेकिन गर्भवती होने की अपनी स्थिति के बारे में पूरी दुनिया को बताना कृत्रिम और भौंडे नाटकीय प्रचार के सस्ता नुस्खा से ज़्यादा कुछ नहीं लगता।

नहीं, मैं किसी व्यक्ति, उसकी किसी स्थिति, उस स्थिति के बारे में किसी खबर या सूचना के खिलाफ नहीं हूं। मैं सूचना बनाने वाले इस तंत्र की चालाकी और इस तंत्र की चपेट में आने वाले लोगों की मासूमियत से दंग हूं।

निजी और अंतरंग सूचना का एक बड़ा बाज़ार तैयार हो रहा है। पोर्न इंडस्टी अपने खरीददारों की बढती मांग पूरी करने के लिए मुख्य धारा के अखबार और टेलीविजन का सहारा ले रही है।

रियलिटी टेलीविज़न शो के नाम पर दिखाए जा रहे कार्यक्रम (एगोनी आंट या मोमेंट आफ टु्रथ) की विषय-वस्तु को गौर से देखिए और डरिये और चेतिए।

आज सेलीब्रिटी की खबर बिक रही है। कल जिसकी खबर बिकेगी वही सेलीब्रिटी होगा। आपके सबसे अंतरंग समय के सीधे प्रसारण के ढेर सारे दर्शक भी मिलेंगे और प्रायोजक भी।

नहीं, न्युड डांस बार के इलाके के सभी पड़ोसियों के लिए यह अनिवार्य नहीं होता कि वे भी अपने कपड़े खोलें और जाकर डांस बार में नाचने लगें।

फेसबुक, ब्लाॅगस्पाॅट, यूट्युब के आने से विचार और सूचना की आवाजाही तेज हुई है , लेकिन इन माध्यमों में जहां आपका कोई संपादक/संचालक नहीं है, वहां आपको अपनी एक एक बात ज्यादा सोच-समझकर रखना होगा। प्रचार की अपनी मायावी भूख पर काबू पाईये और सांस्कृतिक मधुमेह (डायबीटीज़)
के शिकार होने से बचिए।

श्याम आनंद झा

6 comments:

Rashid Ali said...

Baapre...isme to mai bhi shamil ho gaya... apki baat se sahmat nahi hun lekin aapki dhardaar writing ke liye aapko badhai....

Shyam Anand Jha said...

Rashid, Agar Aap Sahmat Nahin Hain, To Apni Baat Aur Apne Tark Rakhiye

AMATYA 'ACKROYD' RAKSHASA said...
This comment has been removed by the author.
Shandilya Upadhyaya said...

Shyamanandjee,

Somebody had said 'brevity is the soul of wisdom'. Your writing personifies it to the hilt. I am reminded of some readings that I had done while doing Masters degree. One of them was Roland Barthes' 'Image, Music, Text' where he talks about the instrumentalization of the subject in the process of receiving an information when the information itself changes its complete form from the moment of inception through the process of dissemination to that of the moment of reception at a particular moment in time. What fascinated me in that reading was the analysis of the author who ironically had proclaimed the concept of the 'death of the author' that how the essence of an idea never gets signified because in the process of signification it losses what it had objected to signify (if there was any to begin with) and becomes an unrecognizable formless epistemic entity. I guess your writing at one level captures this idea of Barthes in an extremely subtle and intelligent manner where I feel that these commodified methods of 'celebration' by the parents of the children change the basic code of constitution of all the players in this great 'theater of the absurd'. At the other level, you are actually elaborating what Marcuse had argued in essence in his 'One Dimensional Man' that Capitalism not only produces commodities but also commodifies our desires, perceptions, notions of the Self along with limiting our vision of human experience to that of a myopic 'shot'. In an age when everything is suspect to doubt, I find it incomprehensible to see people subjecting their idea of 'celebration' without subjecting it to a moment of critical scrutiny. Your write-up speaks to me in ways more than one. And I am happy that it does in that manner. It appears to me like a sword decimating unconsidered un-problematised notions and urging us to subject our 'everyday experience' to a microscopic gaze. I guess I have written more than what counts for a comment. Congratulations to you, once again !!! Hope this sword decimate more 'idols of thought and practice' in times to come. Red Salute ! Comrade !!!

Sadre said...

आपने जिस बहस को छेड़ा है इस में कई राज़ छुपे हैं, इस पर विस्तार से लिखा जाना चाहिए, कियुन्की ये मामला सिर्फ लिखने का ही है ----- इस मुद्दे पर मुझे जो सब से ज्यादा खराब लग रहा है कि कुछ लोग facebook पर कुछ लिख कर खुद के शोहरत के लिए like managment program (LMP) चला रहे हैं , अगर इसका मकसद सत्ता पर दबाव बनाना हो तो थोड़ी देर के लिए बात समझ में आती है --- एक टीम जिनका जे एन यू से कुछ लेना देना नहीं, गंगा ढाबा पर बैठ कर 30 - 40 चाय लोगों को रोज़ पिला डालते हैं, ठीक ठाक पैसे भी खर्च होते हैं जिस कारण बीवी से झगरा भी होता है और जनाब मार भी खाते हैं, ये पहचान की पीड़ा से ग्रस्त लोग हैं ------------
एक साहब ने मेरे से पूछा आप facebook पर बहुत लिखते हो, मैंने कहा हाँ लिखता हूँ , facebook पर " ही " नहीं लिखता, facebook पर " भी " लिखता हूँ --- मेरे लिए facebook का wall जे एन यू का wall है, जो पहले उस wall पर ब्रश से करता था , अब इस wall पर किबोर्ड से करता हूँ , मैंने उनसे पूछा आप ? , वो बोले पहले शेव कर के ढाबा पर बैठा करता था अब facebook पर फोटो डालता रहता हूँ , हम दोनों जोर से हँसे -- हा हा हा हा हा, फिर अचानक उनको लगा गलत जगह सवाल पूछ लिया, अपनी bike स्टार्ट की और चलते बने ,
मीडिया ने आश्वर्य राय के पैरभरी होने को ही नहीं दिखाया और बताया बल्कि ये भी बता डाला कि पूरा बच्चन परिवार चारों धाम के दर्शन को जा रहा है, ये तो हमारे समाज में होता ही आया है कि किसी भी शुभ घरी में लोग खुश होकर अपने तरीके से भगवान् का शुक्रया अदा करता हैं, लेकिन अब माध्यम वर्ग को ये सिखाया जा रहा है कि सभी लोग चारों धाम कि सैर करें, जहाँ एक तरफ खुशखबरी के बाद ज्यादा मुश्किल सफ़र नहीं करने कि सलाह दी जाती है वहीं ये नया झमेला खड़ा कर रहे ताकि लोगों में ऐसा करने का शौक़ बढे और जब बच्चन परिवार यात्रा पर निकले तो TRP .

Dr Kaushal Singh said...

hashiye pe baith kar bat karna ham JNUites ki aadat hai. Bal ke khal nikalna!!
Jindgi ki buniyad hin dusre ke najariye se shuru hoti hai.ham paida hote hin shyamanand jha nahin ho jate, Hamen bataya jata hai. aur, vakt ke sath iski jarurat aur tarike bhi badlte rehte hain. is pe itna akrosh kyon! ise agar akadmik bhasha den to upyogitavad banta hai.
apni bat kehne aur apni tasviren dikhana prachar nahin hai.sahmat hona ya kharij kerna ek soch ko janm deta hai. vicharon ka silsila chal padta hai...aur yahin se insan alehda ho jata hai.yah prachar nahin hai. samanya manav pravriti hai jo kisi bhi sabhyata ki bunyadi jarurat hai.
aap bhi vahi kar rahe hain.